6 GHz वाई-फाई पर ISRO की चिंता क्या है, सरकार क्यों कर रही मंथन?
क्या है खबर?
केंद्र सरकार 6 GHz स्पेक्ट्रम में हाई-पावर आउटडोर वाई-फाई सेवा शुरू करने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। माना जा रहा है कि इससे तेज वायरलेस ब्रॉडबैंड सेवाओं का विस्तार आसान हो सकता है। हालांकि, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने आशंका जताई है कि इससे सैटेलाइट सेवाओं में दिक्कत आ सकती है। सरकार ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है और तकनीकी रिपोर्टों की विस्तार से जांच की जा रही है।
चर्चा
क्या है प्रस्ताव और क्यों हो रही है चर्चा?
सरकार ने इस मामले की जांच के लिए IIT-मद्रास के विशेषज्ञों की एक समिति बनाई थी, जिसमें टेलीकॉम कंपनियों और ISRO के प्रतिनिधि भी शामिल थे। समिति ने यह परखा कि हाई-पावर वाई-फाई से सैटेलाइट नेटवर्क पर कितना असर पड़ सकता है। पिछले साल सरकार ने 6 GHz बैंड का निचला हिस्सा कम क्षमता वाले इनडोर और सीमित आउटडोर उपयोग के लिए खोला था। अब इसके दायरे को बढ़ाने पर विचार हो रहा है।
चिंता
ISRO के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर 6 GHz बैंड में हाई-पावर आउटडोर वाई-फाई की अनुमति दी गई, तो इससे सैटेलाइट संचार सेवाओं में रुकावट आ सकती है। ISRO को आशंका है कि तेज वायरलेस सिग्नल सैटेलाइट अपलिंक में हस्तक्षेप कर सकते हैं, जिससे संचार और डाटा ट्रांसमिशन प्रभावित होने का खतरा रहेगा। इसी वजह से सरकार तकनीकी जांच पूरी होने के बाद ही कोई अंतिम फैसला लेना चाहती है, ताकि सैटेलाइट सेवाओं पर किसी तरह का नकारात्मक असर न पड़े।
समर्थन
टेलीकॉम कंपनियां क्यों कर रही हैं समर्थन?
रिलायंस जियो और भारती एयरटेल जैसी टेलीकॉम कंपनियों का कहना है कि हाई-पावर वाई-फाई की अनुमति मिलने से उन इलाकों में भी तेज इंटरनेट पहुंचाया जा सकेगा, जहां फाइबर नेटवर्क उपलब्ध नहीं है। कंपनियों ने इसके लिए सुझाव दिया है कि सभी डिवाइस का पंजीकरण जरुर किया जाए, ताकि जरूरत पड़ने पर कभी भी उनकी निगरानी की जा सके। इससे सैटेलाइट सेवाओं पर संभावित असर को भी नियंत्रित करना आसान होगा।
राय
विशेषज्ञों की राय और आगे का रास्ता
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि लाइसेंस-फ्री स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल कम क्षमता वाले साझा उपयोग के लिए होना चाहिए। वहीं, दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी बेहतर होगी और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं को भी फायदा मिलेगा। दुनिया के कई देशों में ऐसे सिस्टम पहले से लागू हैं, जहां विशेष तकनीक के जरिए हाई-पावर वाई-फाई और सैटेलाइट सेवाओं के बीच संतुलन बनाए रखा जाता है।