
भारतीय रेलवे का 33 वर्षीय ये कर्मचारी दे रहा गरीब बच्चों को फ्री शिक्षा और खाना
क्या है खबर?
किसी भी देश के विकास के लिए उस देश के बच्चों का शिक्षित होना बहुत जरुरी है। आज के समय में शिक्षा बहुत मंहगी हो गई है और हर कोई अपने बच्चों को पर्याप्त शिक्षा प्रदान नहीं कर पाता है।
वहीं गरीब और वंचित बच्चों को कई लोग फ्री में शिक्षा देते हैं। इसी बीच रेलवे के एक 33 वर्षीय कर्मचारी वंचित बच्चों को फ्री में शिक्षा और खाना दे रहे हैं।
आइए जानें क्या है पूरी खबर।
शुरुआत
2012 में की फ्री कोचिंग सेंटर की शुरूआत
रेलवे के 33 वर्षीय कर्मचारी सुशील मीणा वंचित बच्चों को फ्री में शिक्षा दे रहे हैं।
2012 में भारतीय रेलवे में शामिल होने के बाद सुशील ने तरुण विदेह के साथ मिलकर सरकारी नौकरी के इच्छुक उम्मीदवारों के लिए फ्री कोचिंग सेंटर 'निमन कोचिंग संस्थान' की शुरूआत की।
तरुण एक राष्ट्रीय बैंक में अधिकारी स्तर पर कार्यरत हैं।
अपना ऑफिस का काम करने के बाद और छुट्टी वाले दिन वे कोचिंग देते थे।
बयान
वंचितों को सशक्त बनाना है उद्देश्य
इंडिया टुडे से बात करते हुए सुशील ने कहा कि उनका उद्देश्य वंचितों को सशक्त बनाना, उनके लिए काम करना, उन्हें आत्मनिर्भर बनाना, रोजगार करने योग्य बनाना है, जिससे कि वे एक स्वस्थ, गरिमापूर्ण और गुणवत्ता वाले जीवन का आनंद ले सकें।
प्रभाव
इस बात ने डाला उन पर बड़ा प्रभाव
सुशील ने कहा कि सरकारी नौकरी की तैयारी करते समय उन्होंने कई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वालों को अच्छे घरों में रहते हुए देखा, तो वहीं कई को अपनी जरुरतों को पूरा करने के लिए अन्य नौकरियों को अपनाना पड़ा।
उनके पास अपने सपनों को आगे बढ़ाने के लिए पैसा नहीं था। इसने उन पर बड़ा प्रभाव डाला और उन्होंने फैसला किया कि अगर उन्हें जो नौकरी चाहिए वह मिल जाती है, तो वे ऐसे छात्रों की मदद करेंगे।
बयान
व्यक्ति के विकास पर निर्भर है राष्ट्र का विकास
सुशील ने बताया कि वे अपने कॉलेज के दिनों से ही चाइल्ड लेबर में शामिल बच्चों को देखते थे। उनका मानना है कि व्यक्ति का विकास उसके शिक्षा स्तर पर निर्भर करता है और राष्ट्र का विकास प्रत्येक व्यक्ति के विकास पर निर्भर करता है।
सेंटर
अब चार सेंटर में हैं कुल 3,500 बच्चे
कोचिंग सेंटर के साथ-साथ उन्होंने झुग्गियों के बच्चों को पढ़ाना भी शुरू कर दिया। वे उन बच्चों के पास गए, जिन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा या पैसे कमाने के लिए काम करना पड़ रहा था।
कुछ महीनों के बाद बच्चों की संख्या बढ़ने लगी और अब उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और राजस्थान सहित सभी चार केंद्रों में लगभग 3,500 बच्चे हैं।
शिक्षकों की कमी आने पर उन्होंने परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों से संपर्क किया, लेकिन कोई मदद के लिए नहीं आया।
समस्या
किसी NGO या संस्थान ने नहीं की मदद
सुशील ने बताया कि साल 2014 में उन्होंने इन बच्चों की मदद करने के लिए कई प्रतिष्ठित और विश्व-प्रसिद्ध NGOs, संस्थानों से संपर्क किया, लेकिन या तो उन्हें कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली या उन्हें ऐसे उत्तर मिले जिससे वे निराश हो गए।
लेकिन उनकी टीम आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों और अपने परिवार का समर्थन करने के लिए स्कूल छोड़ने वाले बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करने के लिए काम करती रही।
NGO
साल 2015 में की फाउंडेशन की स्थापना
इन सब के बाद सुशील ने जुलाई, 2015 में निर्भेद फाउंडेशन की स्थापना की। NGO को सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत एक सोसायटी के रूप में रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटीज द्वारा रजिस्टर्ड किया गया।
सुशील की इस पहल से कई बच्चों को भविष्य बन सकता है और उन्हें एक अच्छा जीवन मिल सकता है।
निर्भेद में तीन शिफ्टों दिन, शाम और रात में क्लास लगती हैं। बच्चों को NCERT किताबों के अनुसार पढ़ाया जाता है।
फंड
ऐसे उपलब्ध कराते हैं बच्चों को भोजन
निर्भेद फाउंडेशन में पढ़ाई करने वाले बच्चों को भोजन भी उपलब्ध कराया जाता है। सुशील का कहना है कि विभिन्न केंद्रों में बच्चों को प्रति दिन 700 मील प्रदान किए जाते हैं।
बच्चों के लिए स्टेशनरी और भोजन की व्यवस्था करने के लिए फंड के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि प्राथमिक फंड कोर टीम के सदस्यों के वेतन के माध्यम से और मिलाप नाम के एक क्राउडफंडिंग ऑर्गेनाइजेशन द्वारा आता है।