ईरान के संचालन में राष्ट्रपति और सर्वोच्च नेता में से किसकी होती है अहम भूमिका?
क्या है खबर?
इजरायल और अमेरिका के संयुक्त रूप से हमला करने के बाद इस समय ईरान संकट से जूझ रहा है। हमलों में देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई समेत प्रमुख नेताओं की मौत हो चुकी है। नए सर्वोच्च नेता की ताजपोशी की तैयारी चल रही है। राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन संघर्ष में देश को संभालने में जुटे हुए हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि ईरान के संचालन में राष्ट्रपति और सर्वोच्च नेता में किसकी भूमिका ज्यादा अहम होती है।
उदय
1979 में हुआ नए ईरान का उदय
ईरान में 1979 में लोग सड़कों पर उतर आए थे, क्योंकि 1953 के तख्तापलट के बाद सत्ता हासिल करने वाले शाह मोहम्मद रजा पहलवी ने देश छोड़ दिया था। उनकी जगह निर्वासन से लौटे धर्मगुरु रुहोल्लाह खुमैनी ने सत्ता संभाली थी। इसके साथ ही देश में राजशाही का पतन हो गया था और एक नए ईरान का जन्म हुआ था। हालांकि, इसे केवल गणतंत्र घोषित नहीं किया गया था, बल्कि नए नेतृत्व ने इसे ईरान इस्लामिक गणराज्य नाम दिया था।
मतलब
इस्लामी गणराज्य घोषित करने का क्या था अर्थ?
ईरान को इस्लामी गणराज्य जानबूझकर घोषित किया गया था। इसने जन चुनाव और धार्मिक शासन को एक जगह कर दिया। एक आदर्श गणतंत्र में नागरिक नेताओं और कानून निर्माताओं का चुनाव करते हैं। सत्ता का प्रवाह मतदान से शुरू होकर ऊपर की ओर होता है। कानून संसद द्वारा बनाए जाते हैं और राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री द्वारा लागू किए जाते हैं। देश को सार्वजनिक मामला माना जाता है और वह किसी राजा या शाही परिवार की निजी संपत्ति नहीं रहता है।
व्यवस्था
ईरान में कैसी है व्यवस्था?
ईरान ने गणतंत्र मॉडल के कुछ हिस्सों को बरकरार रखा है। लोग राष्ट्रपति के लिए मतदान करते हैं। वे संसद सदस्यों का चुनाव करते हैं। हालांकि, इस निर्वाचित संरचना के ऊपर शिया इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित धार्मिक निगरानी की परत भी बनाई गई है। 1979 का स्वीकृत संविधान यह घोषणा करता है कि संप्रभुता अंततः ईश्वर के पास है। ऐसे में देश की राजनीतिक सत्ता इस्लामी कानून और मूल्यों के अनुरूप ही होनी चाहिए।
जानकारी
इस तरह हुई सर्वोच्च नेता की शुरुआत
राजनीतिक सत्ता इस्लामी कानून और मूल्यों के अनुरूप होने के सिद्धांत को 'न्यायविद का संरक्षक' (वेलायत-ए फकीह) के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है कि एक वरिष्ठ इस्लामी विद्वान राज्य का मार्गदर्शन करेगा। यहीं से सर्वोच्च नेता की शुरुआत हुई।
अवधारणा
ईरान में कैसे आई थी वलायत-ए फकीह की अवधारणा?
वलायत-ए फकीह का विचार शिया इस्लामी न्यायशास्त्र में सदियों से मौजूद थी, लेकिन एक सीमित धार्मिक अर्थ में। इसका अर्थ यह था कि वरिष्ठ इस्लामी विद्वान विशिष्ट मामलों में संरक्षक के रूप में कार्य कर सकते थे। इनमें धार्मिक बंदोबस्त की देखरेख करना या 12वें इमाम के गुप्तवास के दौरान कानूनी प्रश्नों में समुदाय का मार्गदर्शन करना शामिल था। 1979 की क्रांति के बाद वलायत-ए फकीह की अवधारणा को संविधान में शामिल कर लिया गया।
शक्तियां
सर्वोच्च नेता को अपनी शक्तियां कैसे प्राप्त हुईं?
रुहोल्लाह खुमैनी ने 1960 और 70 के दशक में इस विचार का व्यापक विस्तार किया। बाद में होकुमात-ए इस्लामी (इस्लामी सरकार) के रूप में प्रकाशित अपने व्याख्यानों में उन्होंने तर्क दिया कि एक योग्य इस्लामी न्यायविद को न केवल समाज का आध्यात्मिक मार्गदर्शन करना चाहिए, बल्कि वास्तव में राज्य पर शासन भी करना चाहिए। 1979 की क्रांति के बाद वलायत-ए फकीह के इस विस्तारित संस्करण के तहत राष्ट्रपति से ऊपर सर्वोच्च नेता के पद का सृजित हो गया।
अंतर
राष्ट्रपति और सर्वोच्च नेता की भूमिकाओं में अंतर?
ईरान के राष्ट्रपति का चुनाव जनता द्वारा होता है और वे देश के दैनिक कामकाज का संचालन, मंत्रिमंडल की देखरेख, अर्थव्यवस्था का प्रबंधन और राजनयिक मामलों में देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसके बाद भी वह शीर्ष स्थान पर नहीं है। सर्वोच्च नेता का पद राष्ट्रपति पद से ऊपर होता है। 1989 से लेकर ईरान-अमेरिका-इजराइल संघर्ष में हुई उनकी मृत्यु तक यह पद अली खामेनेई के पास था, जिन्होंने खोमेनी की मृत्यु के बाद उनका स्थान लिया था।
चुनाव
कैसे होता है ईरान के सर्वोच्च नेता का चुनाव?
सर्वोच्च नेता का चुनाव प्रत्यक्ष जनमत संग्रह द्वारा नहीं होता है। इसके बजाय, उनका चुनाव धर्मगुरुओं की एक निर्वाचित संस्था द्वारा किया जाता है जिसे विशेषज्ञों की सभा के नाम से जाना जाता है। उनकी सत्ता का व्यापक विस्तार है। वे सशस्त्र बलों के कमांडर-इन-चीफ हैं। वे न्यायपालिका, राज्य मीडिया और क्रांतिकारी गार्ड सहित प्रमुख सैन्य निकायों के प्रमुखों की नियुक्ति करते हैं। रक्षा, विदेश नीति और व्यापक राष्ट्रीय दिशा से संबंधित मामलों में उनका अंतिम निर्णय होता है।