इजरायल और अमेरिका ने कैसे लगाया खामेनेई का पता? इस तरह ट्रैक कर की गई हत्या
क्या है खबर?
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था। फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, यह कई सालों से चुपचाप चल रहे एक गुप्त और सुनियोजित ऑपरेशन का नतीजा था। बताया गया है कि इसमें साइबर हमले, खुफिया एजेंटों की जमीनी जानकारी और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इजरायल और अमेरिका की एजेंसियों ने मिलकर उनकी हर छोटी-बड़ी गतिविधि पर लगातार नजर रखी और सही मौके का इंतजार किया।
ट्रैफिक कैमरे
ट्रैफिक कैमरों से मिली बड़ी जानकारी
रिपोर्ट में कहा गया है कि तेहरान के कई ट्रैफिक कैमरे लंबे समय से गुप्त रूप से हैक किए गए थे। इन कैमरों की तस्वीरें एन्क्रिप्ट कर बाहर भेजी जाती थीं, जिससे शहर की हर अहम गतिविधि पर लगातार नजर रखी जा सके। खास तौर पर सुरक्षा गार्ड और वरिष्ठ अधिकारियों की गाड़ियों की आवाजाही पर बारीकी से ध्यान दिया गया। इससे यह समझने में मदद मिली कि खामेनेई कब, कितनी देर और कहां मौजूद रहते हैं।
रुकावट
मोबाइल नेटवर्क में भी रुकावट
बताया गया है कि जिस इलाके में उनका दफ्तर था, वहां मोबाइल नेटवर्क में भी तकनीकी रुकावट डाली गई थी। इससे सुरक्षा टीम के सदस्य तुरंत एक-दूसरे से संपर्क नहीं कर सके और अलर्ट सिस्टम कमजोर पड़ गया। खुफिया एजेंसियों ने सुरक्षा कर्मियों के ड्यूटी टाइम, घर के पते, परिवार और रोजाना आने-जाने के रास्तों की जानकारी भी इकट्ठा की थी। इस तरह उनकी रोजमर्रा की गतिविधियों का पूरा और सटीक नक्शा तैयार किया गया।
समय
डाटा विश्लेषण से तय हुआ सही समय
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इकट्ठा की गई सारी जानकारी का गहराई से तकनीकी विश्लेषण किया गया। बड़े स्तर पर डाटा को जोड़कर और मिलाकर यह समझा गया कि किस दिन और किस समय वे सबसे कम सुरक्षा घेरे में होते हैं। अधिकारियों ने इसे 'पैटर्न ऑफ लाइफ' कहा, यानी रोज की आदतों और मुलाकातों का पूरा रिकॉर्ड। इसी आधार पर हमले का सटीक समय चुना गया, ताकि निशाना बिल्कुल सही लगे।
हमला
सटीक समय पर किया गया हमला
रिपोर्ट के अनुसार, जिस दिन हमला हुआ उस समय खामेनेई अपने दफ्तर में एक अहम और गोपनीय बैठक कर रहे थे। खुफिया जानकारी और पहले से जुटाए गए इनपुट के आधार पर उसी समय को चुना गया। इससे पहले ईरान की हवाई सुरक्षा व्यवस्था को भी योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया गया था। अधिकारियों का कहना है कि यह सिर्फ तकनीकी सफलता नहीं थी, बल्कि एक बड़ा और सोचा-समझा राजनीतिक फैसला भी था।