#NewsBytesExplainer: एस्टोनिया के रक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद क्यों चर्चा में है एक भारतीय कंपनी?
क्या है खबर?
यूरोपीय देश एस्टोनिया के रक्षा मंत्री होना पेवकुर ने इस्तीफा दे दिया है। इसके पीछे यूक्रेन के लिए किया गया करीब 768 करोड़ रुपये का एक हथियार समझौता है। आरोप है कि सौदे में फंड का इस्तेमाल एक ऐसी भारतीय कंपनी को किया गया था, जिसके पास तोपखाने के गोले बनाने का कोई अनुभव नहीं था। इसके बाद एक भारतीय कंपनी डाटासेल SRL चर्चाओं में है। आइए इसके बारे में जानते हैं।
बयान
रक्षा मंत्री ने क्या बताई इस्तीफे की वजह?
पेवकुर ने कहा कि एस्टोनिया के राष्ट्रीय लेखापरीक्षा कार्यालय द्वारा किए गए कई अध्ययनों के बाद वे इस घोटाले की 'राजनीतिक जिम्मेदारी' लेते हुए पद छोड़ रहे हैं।
पेवकुर ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, 'एस्टोनियाई सुरक्षा किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है। यह हमारी संयुक्त जिम्मेदारी है। इसलिए मुझे आज पूरे रक्षा क्षेत्र की राजनीतिक जिम्मेदारी लेनी होगी और उचित समय पर रक्षा मंत्री का पदभार प्रधानमंत्री को सौंपना होगा।'
समझौता
किस चीज के लिए हुआ था समझौता?
सौदे के तहत, भारतीय कंपनी से जुड़ी इटली की एक फर्म को गोला-बारूद आपूर्ति का जिम्मा दिया गया था। ये आपूर्ति इटली की कंपनी डेटासेल SRL द्वारा की जानी थी, जिसे नागपुर स्थित नेको डिफेंस मुनिशंस ने अधिग्रहित कर लिया था।
हालांकि, एस्टोनिया ने जिन तोप के गोलों के लिए समझौता किया था, उनका कभी भी डेटासेल ने उत्पादन नहीं किया था। इसके बावजूद कंपनी को भारी-भरकम कॉन्ट्रैक्ट दिया गया और राशि भी पहले ही दे दी गई।
4 समझौते
कंपनी और सरकार के बीच हुए 4 समझौते
2024 में एस्टोनिया के रक्षा निवेश केंद्र (ECDI) ने तोप गोलों की खरीद के लिए डेटासेल के साथ 4 समझौते किए थे।
अगस्त में पहला समझौता हुआ, जिसके लिए 164 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान किया गया।
अक्टूबर में दूसरा समझौता हुआ, जिसके तहत 109 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान किया गया।
इसके बाद 2024 में ही 2 और समझौते हुए, जिसके चलते अग्रिम भुगतान की राशि 768 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
आरोप
डिलीवरी में देरी के चलते रद्द हुआ समझौता
समझौते के तहत, गोला-बारूद की पहली खेप नवंबर 2024 में यूक्रेन पहुंचनी थी, लेकिन देरी हुई। एस्टोनियाई सरकार ने कहा कि बाद में जो सामान मिला, उसमें भी गोले चलाने के लिए जरूरी हिस्से मौजूद नहीं थे।
इसके बाद सरकार ने समझौते रद्द कर दिए।
वहीं, डेटासेल ने तर्क दिया कि अलग-अलग देशों से मंजूरी और जरूरी दस्तावेज मिलने में देरी से डिलीवरी समय पर नहीं हुई।
ये मामला फिलहाल कोर्ट में भी चल रहा है।
कंपनी
समझौते में शामिल भारतीय कंपनी के बारे में क्या पता है?
फर्स्टपोस्ट के मुताबिक, डेटासेल की स्थापना 2005 में इतालवी व्यवसायी सैंड्रो पजिनी ने की थी। 6 मार्च, 2024 को डेटासेल का अधिग्रहण नागपुर स्थित कंपनी नेको डिफेंस मुनिशंस द्वारा कर लिया गया।
नेको मुनिशंस ने वेबसाइट पर लिखा है कि वो नेको ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज का हिस्सा है और इसका कारोबार 7,500 करोड़ रुपये है।
ये कंपनी विभिन्न प्रकार के हथियारों का निर्माण करती है, जिनमें गोला-बारूद और मोर्टार बम शामिल हैं।
सफाई
विवाद पर कंपनी का क्या कहना है?
कंपनी ने कहा कि वह इस विवाद की 'पीड़ित' है और समझौता रद्द करने के कारणों को खारिज करती है।
कंपनी ने कहा कि उसने अग्रिम भुगतान के बदले 636 करोड़ रुपये मूल्य की सामग्री की आपूर्ति की है और उसका बिल भी जारी किया है।
कंपनी ने आपूर्ति में हुई देरी की बात स्वीकार की है, लेकिन कहा कि अनुबंधों के तहत किए गए निरीक्षणों में गुणवत्ता संबंधी कोई समस्या नहीं पाई गई है।