
सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में भारत के सामने अभी भी क्या-क्या चुनौती बनी हुई है?
क्या है खबर?
सेमीकंडक्टर उद्योग के क्षेत्र में भारत खुद को खड़ा करने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। हालांकि, प्रयास के बावजूद इस क्षेत्र में भारत को अभी भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। केंद्र सरकार ने 6 राज्यों में 1.6 लाख करोड़ रुपये की 10 फैब परियोजनाओं को मंजूरी दी है। उम्मीद है कि साल के अंत तक गुजरात से पहली मेड-इन-इंडिया चिप तैयार होगी, जो भारत के लिए एक अहम मील का पत्थर साबित होगी।
चुनौती
तकनीकी निर्भरता की चुनौती
भारत की सबसे बड़ी बाधा तकनीकी निर्भरता है। सेमीकंडक्टर उत्पादन के लिए जरूरी उच्च गति वाली मशीनरी, क्लीनरूम टूल्स और उन्नत डिजाइन क्षमताओं के लिए देश पूरी तरह आयात पर निर्भर है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक इन कमियों को दूर नहीं किया जाता, तब तक भारत का बड़ा सेमीकंडक्टर हब बनना मुश्किल रहेगा। यही कारण है कि तकनीकी अंतर भारत की सेमीकंडक्टर महत्वाकांक्षा के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
प्रतिस्पर्धा
वैश्विक कंपनियां और बढ़ती प्रतिस्पर्धा
भारत की तकनीकी कमी को वैश्विक कंपनियां अवसर के रूप में देख रही हैं। दिल्ली में होने वाले सेमीकॉन इंडिया 2025 में 30 से अधिक देश भारत के साथ साझेदारी की इच्छा जताएंगे। एप्लाइड मैटेरियल्स, IBM, TSMC और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी कंपनियां इसमें शामिल होंगी। ताइवान की डेल्टा इलेक्ट्रॉनिक्स पहले ही 50 करोड़ डॉलर निवेश कर चुकी है। वहीं जापानी, कोरियाई और सिंगापुरी कंपनियां भी भारत के चिप इकोसिस्टम में अपनी जगह बनाने की दौड़ में हैं।
उम्मीदें
सरकार और उद्योग की उम्मीदें
सरकार गुजरात, असम, उत्तर प्रदेश, पंजाब, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में फैब परियोजनाओं को गति दे रही है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि पहली मेड-इन-इंडिया चिप साल के अंत तक तैयार हो जाएगी। उद्योग जगत का मानना है कि शुरुआती साझेदारियां भारत को बड़ा सेमीकंडक्टर हब बनाने में मदद करेंगी। हालांकि, असली सवाल यही है कि क्या भारत अपनी तकनीकी कमियों को तेजी से दूर कर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर पाएगा।