भारत को कृत्रिम सूर्य बनाने की दिशा में मिली बड़ी कामयाबी
कृत्रिम सूर्य बनाने की भारत की कोशिशों को एक बड़ी कामयाबी मिली है। गुजरात के प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने अपने SST-1 टोकामक में 'गाइरोट्रॉन' नाम का एक बेहद शक्तिशाली नया उपकरण लगाया है। इसका मकसद असली तारों में होने वाली न्यूक्लियर फ्यूजन (नाभिकीय संलयन) प्रक्रिया को धरती पर दोहराना है, जिसमें बहुत ज्यादा तापमान और दबाव में हल्के परमाणु नाभिकों को आपस में जोड़ा जाता है।
भारतीय फ्यूजन प्रयोगों में पहले ही 20 करोड़ डिग्री सेल्सियस से ऊपर का प्लाज्मा तापमान हासिल किया जा चुका है।
ऊर्जा के नए स्रोत तलाशने का रास्ता खोलेगा प्रयोग
यह नया गाइरोट्रॉन प्लाज्मा को गर्म करने के लिए हाई-फ्रीक्वेंसी माइक्रोवेव का इस्तेमाल करता है, जिससे रिएक्टर के अंदर प्लाज्मा गर्म और स्थिर बना रहता है।
तारे तो गुरुत्वाकर्षण से यह काम करते हैं, लेकिन धरती पर हमें इसके लिए शक्तिशाली चुम्बकों का सहारा लेना पड़ता है।
हालांकि, अभी हम इस तकनीक से सीधे बिजली बनाने के स्तर तक नहीं पहुंचे हैं, लेकिन भविष्य में स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा हासिल करने की दिशा में यह एक बड़ा कदम है।
यह कदम भविष्य में जीवाश्म ईंधन पर हमारी निर्भरता कम करने और ऊर्जा के नए स्रोत तलाशने का रास्ता भी खोलेगा।