स्पेस-X ने पेंटागन पर स्टारलिंक सेवा के लिए ज्यादा भुगतान का बनाया दबाव- रिपोर्ट
क्या है खबर?
ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच एलन मस्क की अंतरिक्ष कंपनी स्पेस-X और अमेरिकी रक्षा विभाग अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन के बीच नया विवाद सामने आया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेस-X ने पेंटागन से अपनी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक पर ज्यादा पैसे खर्च करने की मांग की है। कंपनी का कहना है कि सेना जिस तरह सेवा का इस्तेमाल कर रही है, उसके हिसाब से मौजूदा प्लान काफी नहीं है।
मामला
ड्रोन को लेकर शुरू हुआ पूरा मामला
यह विवाद LUCAS कामिकेज ड्रोन के इस्तेमाल को लेकर शुरू हुआ। अमेरिकी सेना इन ड्रोन में स्टारलिंक इंटरनेट का इस्तेमाल कर रही थी। पेंटागन का कहना था कि ड्रोन के लिए ज्यादा महंगी सेवा की जरूरत नहीं है, क्योंकि ये ड्रोन कुछ ही समय तक उड़ते हैं और मिशन पूरा होते ही खत्म हो जाते हैं। हालांकि, स्पेस-X का मानना था कि इसके लिए बेहतर और महंगी सेवा जरूरी है। इसी बात पर दोनों के बीच मतभेद बढ़ गया।
खर्च
बढ़ सकता है रक्षा विभाग का खर्च
रिपोर्ट में कहा गया है कि बाद में पेंटागन ने स्पेस-X की बात मान ली, जिससे हर LUCAS ड्रोन पर खर्च पहले के मुकाबले काफी बढ़ गया और एक ड्रोन की लागत लगभग दोगुनी हो गई है। ऐसे समय में जब अमेरिका पहले से ईरान के साथ तनाव में है, रक्षा खर्च का बढ़ना नई चिंता माना जा रहा है। इससे अमेरिकी सेना के बजट पर असर पड़ सकता है और आगे की योजनाओं पर भी दबाव बढ़ सकता है।
IPO
स्पेस-X की ताकत लगातार बढ़ रही
इस बीच स्पेस-X की पकड़ दुनियाभर में मजबूत होती जा रही है। कंपनी की स्टारलिंक और स्टारशील्ड सेवाएं कई देशों के लिए जरूरी बनती जा रही हैं। युद्ध वाले इलाकों में भी इसकी मदद ली जा रही है। यही वजह है कि स्पेस-X का असर लगातार बढ़ रहा है। कंपनी जून में अपना IPO लाने की तैयारी में भी है। इसे दुनिया के सबसे बड़े IPO में से एक माना जा रहा है, जिस पर सबकी नजर बनी हुई है।
विकल्प
पेंटागन के पास विकल्प अभी कम
पेंटागन ने कहा है कि वह स्टारलिंक के अलावा दूसरे विकल्प भी तलाश रहा है, लेकिन अभी ऐसा करना आसान नहीं दिख रहा। रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेसएक्स के हजारों सैटेलाइट अंतरिक्ष में काम कर रहे हैं और उसका नेटवर्क काफी बड़ा है। दूसरी कंपनियां जैसे अमेजन का कुईपर और यूटेलसैट वनवेब अभी उस स्तर तक नहीं पहुंच पाए हैं। ऐसे में फिलहाल अमेरिकी रक्षा विभाग के पास बहुत ज्यादा मजबूत विकल्प नजर नहीं आ रहे हैं।