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सरकार का स्मार्टफोन निर्माताओं के सोर्स कोड शेयर करने का प्रस्ताव, कंपनियों ने किया विरोध 
सरकार स्मार्टफोन निर्माताओं को सोर्स कोड शेयर करने का प्रस्ताव दे सकती है

सरकार का स्मार्टफोन निर्माताओं के सोर्स कोड शेयर करने का प्रस्ताव, कंपनियों ने किया विरोध 

Jan 11, 2026
07:18 pm

क्या है खबर?

भारत सरकार ने स्मार्टफोन निर्माताओं को सोर्स कोड साझा करने और सुरक्षा उपायों के तहत कई सॉफ्टवेयर परिवर्तन करने के लिए बाध्य करने का प्रस्ताव रखा है। इससे ऐपल और सैमसंग जैसी दिग्गज कंपनियों की ओर से विरोध शुरू हो गया है। उनका तर्क है कि प्रस्तावित 83-सूत्रीय सुरक्षा मानक पैकेज है, जिसमें प्रमुख सॉफ्टवेयर अपडेट की सूचना सरकार को देना भी शामिल है। इसका वैश्विक स्तर पर कोई उदाहरण नहीं है और इससे गोपनीय जानकारी उजागर हो सकती है।

आवश्यकता 

इसलिए पड़ी इन उपायों की आवश्यकता 

सूचना प्रौद्योगिकी सचिव एस. कृष्णन ने कहा है कि "उद्योग की किसी भी जायज चिंता पर खुले मन से विचार किया जाएगा।" साथ कहा कि इस मामले में अभी और अधिक निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। यह योजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन प्रयासों का हिस्सा है, जिनका उद्देश्य भारत में बढ़ते ऑनलाइन धोखाधड़ी और डाटा लीक के मद्देनजर यूजर्स डाटा सुरक्षा को मजबूत करना है। भारत 75 करोड़ के साथ दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन बाजार है।

परीक्षण 

भारतीय प्रयोगशालाओं में होगा परीक्षण 

प्रस्तावित भारतीय दूरसंचार सुरक्षा आश्वासन आवश्यकताओं में सोर्स कोड तक पहुंच जैसी कुछ सबसे संवेदनशील आवश्यकताएं शामिल हैं। यह फोन को काम करने योग्य बनाने वाले इन-बिल्ट प्रोग्रामिंग निर्देश हैं। दस्तावेजों से पता चलता है कि इसका विश्लेषण किया जाएगा और संभवतः निर्दिष्ट भारतीय प्रयोगशालाओं में इसका परीक्षण किया जाएगा। प्रस्तावों में कंपनियों को सॉफ्टवेयर में ऐसे बदलाव करने की भी आवश्यकता है, जिससे पहले से इंस्टॉल किए गए ऐप्स को अनइंस्टॉल किया जा सके।

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विरोध 

इस कारण कंपनियां कर रहीं विरोध 

उद्योग जगत ने इस बात पर चिंता जताई है कि किसी भी देश ने इस तरह की वैश्विक सुरक्षा आवश्यकताओं को अनिवार्य नहीं किया है। 2023 में तैयार किए गए ये मानक अब कानूनी प्रवर्तन के लिए विचाराधीन हैं। स्मार्टफोन निर्माता अपने सोर्स कोड की कड़ी सुरक्षा के लिए जाने जाते हैं। ऐपल ने 2014-2016 के बीच चीन के सोर्स कोड के अनुरोध को पहले ही अस्वीकार कर दिया था, जबकि अमेरिकी कानून प्रवर्तन एजेंसियां ​​भी प्रयासों में विफल रहीं।

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