सुवेंदु अधिकारी कौन हैं, जो होंगे पश्चिम बंगाल में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री?
क्या है खबर?
सुवेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। आज कोलकाता में हुई विधायक दल की बैठक में उन्हें नेता चुना गया है। बैठक की अध्यक्षता कर रहे गृह मंत्री अमित शाह ने खुद सुवेंदु के नाम का ऐलान किया है। सुवेंदु कल कोलकाता में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत NDA के तमाम बड़े नेता मौजूद रहेंगे। आइए सुवेंदु के बारे में जानते हैं।
शुरुआती जीवन
सुवेंदु को विरासत में मिली है सियासत
सुवेंदु का जन्म पूर्वी मेदिनीपुर में 15 दिसंबर, 1970 को हुआ था। उन्हें राजनीति विरासत में मिली है। उनके पिता शिशिर अधिकारी मनमोहन सिंह सरकार में पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री थे। मेदिनीपुर के क्षेत्र पर दशकों से अधिकारी परिवार का प्रभाव रहा है। उन्होंने पश्चिम बंगाल के कांथी स्थित पीके कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई की है। उन्होंने प्रसिद्ध रवींद्र भारती विश्वविद्यालय से भी पढ़ाई की है। कॉलेज के दिनों में ही वे छात्र राजनीति में सक्रिय हो गए थे।
राजनीति
कैसे रखा राजनीति में कदम?
सुवेंदु ने अपना राजनीतिक करियर 1989 में कांग्रेस की छात्र परिषद से शुरू किया। 1995 में कांथी नगर पालिका में पार्षद के रूप में चुनकर उन्होंने अपने चुनावी सफर की औपचारिक शुरुआत की। ममता बनर्जी ने 1998 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की नींव रखीं, तो अधिकारी TMC से जुड़ गए। 2006 में कांथी दक्षिण सीट से जीतकर वे पहली बार विधायक चुने गए। इसी साल सुवेंदु को कांथी नगरपालिका का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
नंदीग्राम
नंदीग्राम आंदोलन से बड़ा चेहरा बने सुवेंदु
सुवेंदु के जीवन का अहम मोड़ साल 2007 में आया, जब वामपंथी सरकार ने नंदीग्राम में केमिकल हब बनाने के लिए किसानों की जमीन अधिग्रहित करने का फैसला किया। सुवेंदु इसके खिलाफ जमीन पर उतर गए। उन्होंने 'भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी' (BUPC) बनाई और लोगों को एकजुट किया। माना जाता है कि TMC को सत्ता तक पहुंचाने में जिस नंदीग्राम आंदोलन ने अहम भूमिका निभाई, उसके मुख्य कर्ताधर्ता सुवेंदु ही थे।
सीट
मोदी लहर में भी बचाए रखी सीट
2011 के विधानसभा चुनाव में TMC को भारी जीत मिली। यहां से सुवेंदु विधायक से बढ़कर TMC में केंद्रीय भूमिका में आ गए। 2009 में उन्होंने तमलुक सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीते। 2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी लहर के बावजूद उन्होंने अपनी सीट पर कब्जा बनाए रखा। 2016 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने नंदीग्राम से चुनाव जीता और ममता मंत्रिमंडल में परिवहन मंत्री बनाए गए। उनकी हैसियत सरकार में नंबर 2 की हो गई।
दूरी
क्यों बढ़ी TMC से दूरी?
सुवेंदु की TMC से दूरी बढ़ने की 2 वजहें मानी जाती हैं। पहली- 2019 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद TMC में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की एंट्री हुई। कहा जाता है कि इससे सुवेंदु को लगने लगा कि कार्पोरेट स्टाइल राजनीति में उनकी उपेक्षा होने लगेगी। दूसरी- TMC में ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी का वर्चस्व बढ़ने लगा। दिसंबर, 2020 में उन्होंने TMC छोड़ दी और 2021 विधानसभा चुनावों से ठीक पहले भाजपा में शामिल हो गए।
सफर
भाजपा को 3 से 207 सीटों तक पहुंचाया
2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 3 सीटें मिली थीं। 2021 विधानसभा चुनाव से करीब 4 महीने पहले भाजपा में आए सुवेंदु ने पार्टी की सीटें 3 से बढ़ाकर 77 पर पहुंचा दी। एक बड़ा उलटफेर करते हुए उन्होंने नंदीग्राम से मुख्यमंत्री ममता को हरा दिया। सुवेंदु को विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया गया। इस दौरान वे लगातार TMC सरकार पर हमलावर रहे। हालिया चुनावों में भाजपा ने 207 सीटें जीतकर TMC को सत्ता से हटा दिया।