बर्तन साफ करने वाला स्पंज बढ़ा सकता है माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण, नई रिसर्च में खुलासा
क्या है खबर?
किचन में इस्तेमाल होने वाले सामान्य स्पंज को लेकर एक नई रिसर्च में चौंकाने वाली बात सामने आई है। बॉन विश्वविद्यालय की एक रिसर्च के अनुसार, बर्तन साफ करने वाले स्पंज इस्तेमाल के दौरान पानी में माइक्रोप्लास्टिक कण छोड़ सकते हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि जैसे-जैसे स्पंज पुराने और घिसे हुए होते जाते हैं, उनसे छोटे-छोटे प्लास्टिक कण निकलते रहते हैं। ये कण आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन लंबे समय तक पर्यावरण में बने रह सकते हैं।
परीक्षण
घरों और लैब में किया गया परीक्षण
इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने जर्मनी और उत्तरी अमेरिका के कई घरों को शामिल किया। लोगों ने अपने रोजमर्रा के तरीके से अलग-अलग प्रकार के स्पंज इस्तेमाल किए और उनकी जानकारी दर्ज की। इसके साथ ही लैब में 'स्पंजबॉट' नाम की एक मशीन का उपयोग किया गया, जिसने बर्तन धोने के दौरान होने वाले दबाव और रगड़ को दोहराया। इससे वैज्ञानिकों को समझने में मदद मिली कि स्पंज समय के साथ कैसे टूटते और घिसते हैं।
प्लास्टिक कण
हर स्पंज से निकले प्लास्टिक कण
अध्ययन में जांचे गए सभी स्पंज से माइक्रोप्लास्टिक निकलने की पुष्टि हुई। हालांकि, इसकी मात्रा स्पंज की बनावट और सामग्री पर निर्भर रही। शोधकर्ताओं के अनुसार, एक व्यक्ति के उपयोग से सालभर में लगभग 0.68 ग्राम से 4.21 ग्राम तक माइक्रोप्लास्टिक निकल सकता है। अगर ऐसे स्पंज का बड़े स्तर पर उपयोग हो, तो कुल उत्सर्जन सैकड़ों टन तक पहुंच सकता है। इनमें से कुछ कण गंदे पानी के सिस्टम में रुक जाते हैं, लेकिन सभी नहीं।
सलाह
कम पानी और बेहतर स्पंज अपनाने की सलाह
शोध में यह भी सामने आया कि पर्यावरण पर सबसे बड़ा असर सिर्फ माइक्रोप्लास्टिक नहीं, बल्कि बर्तन धोने में होने वाली अधिक पानी की खपत से पड़ता है। कुल पर्यावरणीय नुकसान में पानी के उपयोग की हिस्सेदारी लगभग 85-97 प्रतिशत तक पाई गई। शोधकर्ताओं ने सलाह दी है कि लोग कम पानी का इस्तेमाल करें, कम प्लास्टिक वाले स्पंज चुनें और उन्हें अधिक समय तक उपयोग में रखें। इससे पर्यावरण पर पड़ने वाला असर कम किया जा सकता है।