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#NewsBytesExplainer: ईरान में सत्ता परिवर्तन से भारत के लिए नुकसान या फायदा?
ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई के साथ प्रधानमंत्री मोदी (फाइल तस्वीर)

#NewsBytesExplainer: ईरान में सत्ता परिवर्तन से भारत के लिए नुकसान या फायदा?

लेखन आबिद खान
Jan 15, 2026
02:19 pm

क्या है खबर?

ईरान में बढ़ती महंगाई और आयातुल्लाह अली खामेनेई के नेतृत्व के खिलाफ प्रदर्शन बढ़ता जा रहा है। अमेरिका ने भी सैन्य हस्तक्षेप के संकेत दिए हैं। इसके बाद स्थिति जटिल हो गई है और भारत हालात पर बारीकी से नजर रख रहा है। भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंध है और ये हमारी पश्चिम एशिया नीति के लिए भी अहम है। आइए जानते हैं ईरान में सत्ता परिवर्तन के भारत के लिए क्या मायने हैं।

निवेश

खतरे में पड़ सकती है चाबहार बंदरगाह परियोजना

भारत की रणनीति के केंद्र में ईरान का चाबहार बंदरगाह है, जो पाकिस्तान को बाईपास करते हुए जमीन और रेल के जरिए भारत को मध्य एशिया से जोड़ता है। भारत ने इसे विकसित करने के लिए अरबों रुपये का निवेश किया है। टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राजन कुमार ने कहा, "खामेनेई के बाद सत्ता संघर्ष में चाबहार एक रणनीतिक संपत्ति बनने के बजाय अस्थिरता का बंधक बनने का जोखिम उठा रहा है।"

अहमियत

भारत की दशकों की कूटनीतिक मेहनत बर्बाद होने की आशंका

पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत के जमीनी रास्ते बंद करने के बाद ईरान नई दिल्ली के लिए एकमात्र व्यवहार्य पश्चिमी गलियारा है। साथ ही तेहरान का शिया नेतृत्व भी पाकिस्तान के प्रभाव को संतुलित करने का काम करता रहा है। यानी ईरान में परिवर्तन इस क्षेत्र में भारत के रणनीतिक दांव-पेंच पर प्रतिकूल असर डाल सकता है। इससे भारत द्वारा दशकों से बनाए गए राजनयिक गठबंधनों, व्यापार मार्गों और सुरक्षा समीकरणों को नया आकार मिल सकता है।

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पाकिस्तान

पाकिस्तान के लिहाज से भी अहम है ईरान

मुस्लिम-बहुसंख्यक देश होने के बावजूद ईरान ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान के प्रभाव को संतुलित करता रहा है। तेहरान का शिया नेतृत्व पाकिस्तान में सुन्नी चरमपंथी समूहों का आलोचक रहा है, जो अक्सर भारत विरोधी टिप्पणियां करते हैं। 1990 के दशक में पाकिस्तान ने कश्मीर को लेकर भारत पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाने की कोशिश की, तो ईरान भारत के पक्ष में खड़ा रहा। ईरान में उथल-पुथल का पाकिस्तान को अप्रत्यक्ष तौर पर फायदा होगा।

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विशेषज्ञ

क्या कह रहे हैं जानकार?

पूर्व भारतीय राजनयिक निरुपमा मेनन राव ने कहा, "भारत को सभी घटनाक्रमों का बारीकी से आकलन करना चाहिए, निष्कर्ष पर पहुंचने में जल्दबाजी से बचना चाहिए और कई संभावित परिदृश्यों के आधार पर अआकलन करना चाहिए। अगर ईरान लंबे समय तक अस्थिर रहा, तो इसके परिणाम सीमित नहीं रहेंगे। पश्चिम एशिया में अराजकता ऊर्जा बाजारों, शिपिंग मार्गों, प्रवासी कमजोरियों, उग्रवाद और आपराधिक नेटवर्क की व्यापक पारिस्थितिकी के माध्यम से तेजी से फैल सकती है। दक्षिण एशिया इससे अछूता नहीं है।"

इतिहास

भारत-ईरान संबंधों का इतिहास

भारत और ईरान के बीच ऐतिहासिक रूप से मजबूत संबंध रहे हैं। 15 मार्च, 1950 को दोनों देशों ने एक मैत्री संधि पर हस्ताक्षर किए थे। पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1959 में ईरान की यात्रा की थी। उनके बाद से 6 भारतीय प्रधानमंत्री ईरान जा चुके हैं। 1956 में शाह मोहम्मद रजा पहलवी भारत आने वाले पहले ईरानी प्रधानमंत्री थे। इसके बाद से दोनों देशों के नेताओं के बीच लगातार आना-जाना लगा हुआ है।

आर्थिक संबंध

कैसे हैं भारत-ईरान के आर्थिक संबंध? 

वित्त वर्ष 2022-23 के दौरान भारत-ईरान के बीच 19,000 करोड़ रुपये का द्विपक्षीय व्यापार हुआ, जो बीते वर्ष की तुलना में 21.76 प्रतिशत ज्यादा है। इस दौरान ईरान को भारत का निर्यात 13,000 करोड़ रुपये ईरान से भारत का आयात 6,000 करोड़ रुपये का रहा। बीते कुछ सालों से भारत ईरान के 5 सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है। दोनों के बीच चावल, चाय, चीनी, दवाइयां, मशीनरी, सूखे मेवे और रसायन का आयात-निर्यात होता है।

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