सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के मुद्दे पर राज्य सरकारों को क्यों लगाई फटकार?
क्या है खबर?
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (19 मई) को आवारा कुत्तों के प्रबंधन से संबंधित सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि जब नागरिक सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों के हमलों का सामना कर रहे हों तो राज्य सरकारें निष्क्रिय दर्शक नहीं बन सकती हैं। जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारी की पीठ ने कहा कि पशु जन्म नियंत्रण (ABC) ढांचे के वर्षों से खराब कार्यान्वयन के कारण देश में आवारा कुत्तों का संकट खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।
निंदा
कोर्ट ने की राज्यों में प्रयासों की कमी की निंदा
कोर्ट ने कहा कि 2001 में शुरू की गई व्यवस्था में आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी को रोकने के प्रयासों की स्पष्ट कमी रही। नसबंदी और टीकाकरण अभियान अनियमित रहे हैं। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा, "जीवन के अधिकार में बिना किसी हमले के भय के स्वतंत्र घूमने का अधिकार शामिल है। संविधान ऐसे समाज की कल्पना नहीं करता जहां बच्चे और बुजुर्ग शारीरिक शक्ति या संयोग के भरोसे जीवित रहने को मजबूर हों।"
जानकारी
सुप्रीम कोर्ट ने दी अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी
कोर्ट ने अधिकारियों को निरंतर निष्क्रियता के खिलाफ चेतावनी देते हुए कहा कि उसके निर्देशों और भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (AWBI) ढांचे के पालन में लापरवाही करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों की मामले की सुनवाई?
कोर्ट ने पिछले साल जुलाई में आवारा कुत्तों के मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लिया था, जब उसने नई दिल्ली में एक 6 वर्षीय बच्ची की कुत्ते के काटने और रेबीज संक्रमण के संदेह में मौत खबर पढ़ी थी। इन घटनाओं, कुत्तों के हमलों और रेबीज से होने वाली मौतों में वृद्धि को चिंताजनक बताते हुए कोर्ट ने कहा कि वर्तमान समय में आवारा कुत्तों का मुद्दा सार्वजनिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है।
पृष्ठभूमि
सबसे पहले मामले में किसने की थी सुनवाई?
यह मामला सर्वप्रथम जस्टिस जेबी परिदवाला और आर महादेवन की पीठ के समक्ष आया, जिन्होंने अगस्त 2025 में दिल्ली-NCR के सभी नगर निगम अधिकारियों को सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को उठाकर आश्रय स्थलों में भेजने का निर्देश दिया था। इस आदेश के बाद पशु कल्याण समूहों और कुत्ते पालने वालों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया, जिन्होंने तर्क दिया कि कोर्ट की ओर से जारी निर्देश पशु जन्म नियंत्रण नियम 2023 के विपरीत हैं।
नरमी
कोर्ट ने अपने आदेश में बरती नरमी
कोर्ट के आदेश को रद्द करने के लिए कई याचिकाएं दायर की गई। आखिर में मामला जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ में पहुंचा। कोर्ट ने पूर्व निर्देशों में नरमी बरतते हुए ABC नियमों के तहत मौजूदा नसबंदी और छोड़ने की नीति को बहाल कर दिया, साथ ही अधिकारियों को रेबीज से ग्रसित या आक्रामक कुत्तों को आश्रय स्थलों में रखने की अनुमति दी। कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों को खाना खिलाने पर भी रोक लगा दी।
शिकायत
लोगों ने की अधिकारियों की विफलता की शिकायत
स्थानीय समूहों और कुत्ते के काटने से पीड़ित लोगों के परिवारों ने तर्क दिया कि अधिकारी बढ़ते हमलों को नियंत्रित करने में विफल रहे हैं, खासकर स्कूलों, अस्पतालों, आवासीय कॉलोनियों आदि के पास। बच्चे और बुजुर्ग बार-बार हमलों का शिकार हो रहे हैं। पशु कल्याण समूहों का तर्क था कि कुत्तों को बड़े पैमाने पर हटाना न तो टिकाऊ था और न ही प्रभावी। नसबंदी किए गए कुत्तों को हटाने से केवल नए कुत्तों के लिए जगह बनेगी।
आदेश
कोर्ट ने क्या दिया ताजा आदेश?
कोर्ट मंगलवार को ताजा आदेश में मामले से जुड़ी सभी याचिकाएं खारिज कर दीं और नवंबर 2025 के अपने आदेश को भी वापस लेने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि अगर आवश्यक हो, तो राज्य सरकारों को रेबीज से संक्रमित और लाइलाज माने जाने वाले बीमार, खतरनाक और आक्रामक कुत्तों को इच्छामृत्यु देने में संकोच नहीं करना चाहिए। बता दें कि कोर्ट ने इस मामले में 29 जनवरी, 2026 को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
अन्य
कोर्ट ने क्या दिए अन्य आदेश?
कोर्ट ने प्रत्येक जिले में एक पूर्णतः कार्यरत ABC केंद्र की स्थापना करने, कोर्ट के निर्देश लागू करने, रेबीज रोधी दवा की उपलब्धता, राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवारा पशुओं की समस्या का समाधान और पुराने परिवहन वाहनों की तैनाती करने, NHAI निगरानी और समन्वय ढांचा स्थापित करने और खतरे को कम करने के लिए इच्छामृत्यु देने जैसे कानून अनुमत उपाय करने को कहा है। इस मामले में नगरपालिका, प्रशासन को उचित संरक्षण प्राप्त होगा और उन पर कोई FIR नहीं होगी।
नियम
क्या कहते हैं ABC के नियम?
पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के अंतर्गत जारी पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023 में आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने के प्राथमिक उपाय के रूप में नसबंदी और रेबीज रोधी टीकाकरण को मान्यता देते हुए उन्हें नसबंदी के बाद उसी क्षेत्र में वापस छोड़ छोड़ने को कहा गया है। कुत्तों को अंधाधुंध मारना या स्थानांतरित करना प्रतिबंधित है। इच्छामृत्यु केवल रेबीज से ग्रसित, असाध्य रोग से ग्रसित या जानवर के गंभीर रूप से घायल होने पर ही अनुमत है।