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#NewsBytesExplainer: भारत की ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने के लिए एशियाई देशों में क्यों मची होड़?
कई एशियाई देश ब्रह्मोस मिसाइल को खरीदने में रुचि दिखा रहे हैं

#NewsBytesExplainer: भारत की ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने के लिए एशियाई देशों में क्यों मची होड़?

लेखन आबिद खान
Jun 03, 2026
02:41 pm

क्या है खबर?

सैन्य हथियार और उपकरणों के मामले में भारत अब आयातक की भूमिका से निकलकर निर्यातक बनने की ओर है। 2025-26 में देश का रक्षा निर्यात अब तक के सबसे ऊंचे स्तर 38,424 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। रक्षा निर्यात को बढ़ावा देने वाले हथियारों में ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली प्रमुख है, जिसे खरीदने में कई एशियाई देश रुचि दिखा रहे हैं। आइए समझते हैं कि क्यों देश ब्रह्मोस को खरीदने की होड़ में हैं।

मिसाइल

सबसे पहले ब्रह्मोस मिसाइल के बारे में जानिए

ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों को भारत-रूस के संयुक्त उद्यम ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड बनाता है। इन्हें पनडुब्बियों, जहाजों, विमानों या जमीनी प्लेटफार्मों से लॉन्च किया जा सकता है। यह भारतीय सशस्त्र बलों के प्रमुख हथियारों में है, जिसे सेना, नौसेना और वायु सेना उपयोग करती है। सेना को पहली बार 2007 में ये मिसाइलें मिली थीं। इसके मूल संस्करण की रेंज 290 किलोमीटर है, जिसे बढ़ाकर 450 से लेकर 800 किलोमीटर तक किया जा रहा है।

खासियत

क्या है ब्रह्मोस मिसाइल की खासियत?

यह मिसाइल मैक 2.8 से 3.0 की रफ्तार से उड़ती है। यानी आवाज की गति से लगभग 3 गुना तेज। ब्रह्मोस बेहद कम ऊंचाई पर उड़ने में सक्षम है। इसके चलते ये आसानी से रडार की पकड़ में नहीं आती है। यह 200 से 300 किलोग्राम तक के पारंपरिक विस्फोटक ले जाने में सक्षम है। पाकिस्तान के खिलाफ 'ऑपरेशन सिंदूर' में पाकिस्तानी हवाई अड्डों, छावनियों और अन्य सैन्य बुनियादी ढांचे पर ब्रह्मोस से हमला किया गया था।

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फिलीपींस

फिलीपींस ने सबसे पहले खरीदी थी ब्रह्मोस

भारत ने 2022 में फिलीपींस के साथ करीब 2,700 करोड़ रुपये में 3 ब्रह्मोस मिसाइल बैटरी के लिए समझौता किया था। ये ब्रह्मोस की पहली अंतरराष्ट्रीय बिक्री थी। पहली बैटरी अप्रैल 2024 में भेजी गई, जबकि दूसरी पिछले साल भेजी गई। इंडोनेशिया के साथ करीब 3,600 करोड़ रुपये का सौदा अंतिम चरण में है। इसी हफ्ते वियतनाम के साथ भी 5,800 करोड़ रुपये का समझौता हुआ है। मलेशिया और थाइलैंड ने भी ब्रह्मोस खरीदने में रुचि दिखाई है।

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वजह

एशिया में क्यों बढ़ी ब्रह्मोस की मांग?

भू-रणनीतिज्ञ डॉक्टर ब्रह्मा चेलानी के मुताबिक, फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों के पास चीन की बढ़ती नौसैनिक शक्ति और समुद्री विस्तारवाद से निपटने के लिए जरूरी नौसैनिक बजट की कमी है। उन्होंने कहा, 'रणनीतिक दृष्टि से ब्रह्मोस गरीब राष्ट्रों के लिए महान नौसैनिक समतुल्य हथियार के रूप में उभरा है- अपेक्षाकृत सस्ता हथियार जो अधिक शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी पर असमानुपातिक लागत थोपने में सक्षम है। तटीय इलाकों में ब्रह्मोस तैनात कर ये देश समुद्री सीमाओं को मजबूत कर सकते हैं।'

चीन

भारत को क्या फायदा?

दक्षिण चीन सागर में चीन की मौजूदगी नए विवाद को जन्म दे रही है। फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया तीनों के दक्षिण चीन सागर के क्षेत्रों को लेकर चीन के साथ विवाद हैं। चीन पूरे दक्षिण चीन सागर को अपना हिस्सा मानता है। ब्रह्मोस के निर्यात से हिंद प्रशांत क्षेत्र में न सिर्फ भारत की मौजूदगी मजबूत होगी बल्कि चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में भी मदद मिलेगी।

अन्य समझौते

ब्रह्मोस के अलावा इन प्रणालियों में भी देशों की रुचि

ब्रह्मोस के अलावा आकाश, पिनाका और नागास्त्र जैसे हथियारों में भी कई देशों ने रुचि दिखाई है। आकाश की डिलीवरी अर्मेनिया को जारी है। अफ्रीका और दक्षिण अमेरिकी देशों ने इसे खरीदने की इच्छा जाहिर की है। खबरें हैं कि पिनाका रॉकेट प्रणाली को खरीदने में फ्रांस की दिलचस्पी है। साइप्रस ने नागास्त्र-1 को खरीदने में रुचि दिखाई है। सरकार ने 2029-30 तक 50,000 करोड़ रुपए का रक्षा निर्यात लक्ष्य रखा है।

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