जगन्नाथ, तिरुपति से लेकर वैष्णोदेवी तक; बड़े मंदिरों में कैसे होता है दान का प्रबंधन?
क्या है खबर?
अयोध्या का राम मंदिर दान में हुई गड़बड़ी के चलते देशभर में चर्चा में है। मंदिर में दान की गणना और बैंक से जुड़े कर्मचारियों ने ही राशि में हेरफेर की, जिसके चलते मंदिर प्रबंधन को करोड़ों की चपत लगी है। अब तक 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। राम मंदिर की तरह ही देश के कई बड़े मंदिरों में रोजाना लाखों-करोड़ों का चंदा और चढ़ावा आता है। आइए बड़े मंदिरों की दान व्यवस्था को समझते हैं।
तिरुपति
तिरुपति में 'परकामणि' प्रणाली से संभाला जाता है दान-चढ़ावा
तिरुपति मंदिर में 'परकामणि' प्रणाली के तहत दान का हिसाब रखा जाता है। तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) के स्थायी कर्मचारी, सरकारी बैंकों के प्रतिनिधि और गहन जांच के बाद चुने गए वॉलंटियर दान की गिनती का काम करते हैं। यह सारा काम मंदिर के विजिलेंस विंग और CCTV कैमरों की निगरानी में किया जाता है। कर्मचारी बिना जेब वाले कपड़े पहनते हैं। गणना कक्ष में आते और जाते समय सबकी तलाशी ली जाती है।
जगन्नाथ
जगन्नाथ मंदिर में राजपत्रित अधिकारी की देखरेख में खुलते हैं दानपात्र
जगन्नाथ पुरी मंदिर में दान और चढ़ावे के प्रबंधन की पूरी प्रक्रिया पहले से निर्धारित है। मंदिर प्रशासन या किसी अधिकृत राजपत्रित अधिकारी की देखरेख में दानपात्र खोले जाते हैं। इस दौरान मंदिर समिति का एक सदस्य भी मौजूद रहता है। हर दान पात्र को खोलने से पहले और बाद में सील किया जाता है। पूरी जानकारी एक फॉर्म में भरी जाती है। बैंक में जमा करने से पहले राशि और चढ़ावे की एक रजिस्टर में एंट्री की जाती है।
वैष्णो देवी
वैष्णो देवी: चढ़ावे को हेलीकॉप्टर से ले जाने की भी व्यवस्था
वैष्णो देवी मंदिर में दान पेटियों को अलग-अलग ट्रस्टियों या धार्मिक अधिकारियों के बजाय अकाउंट्स ऑफिसर, एरिया मैनेजर और सिक्योरिटी स्टाफ वाली समितियां खोलती हैं। वित्त, सुरक्षा और प्रबंधन का काम श्राइन बोर्ड के तहत आने वाले प्रशासनिक विभाग संभालते हैं। मंदिर पहाड़ी इलाके में होने की वजह से बोर्ड कीमती सामान को सुरक्षित तरीके से लाने-ले जाने के लिए खास प्रक्रिया अपनाता है। इसमें बैटरी से चलने वाली गाड़ियां और जरूरत पड़ने पर हेलीकॉप्टर भी शामिल हैं।
सिद्धिविनायक
हर गुरुवार को खुलता है सिद्धिविनायक का दान पात्र
सिद्धिविनायक मंदिर में गिनती की मेज पर ही स्वतंत्र निगरानी शुरू हो जाती है। इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कोषाध्यक्ष पवन त्रिपाठी ने बताया, "मुख्य दान-पात्र को हर गुरुवार को एक कार्यकारी अधिकारी, एक ट्रस्टी, बैंक के प्रतिनिधि और ऑडिटर की मौजूदगी में CCTV की निगरानी में खोला जाता है। नकदी की गिनती की जाती है, उसे बही-खातों में दर्ज किया जाता है और तय बैंक खातों में जमा करने के लिए ले जाया जाता है।"
काशी विश्वनाथ
काशी विश्वनाथ में जिला प्रशासन भी रहता है शामिल
काशी विश्वनाथ मंदिर में जिला प्रशासन भी दान प्रक्रिया के प्रबंधन में शामिल रहता है। मंदिर के 56 दान-पात्र एक सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट की देखरेख में खोले जाते हैं, जबकि गिनती बैंक अधिकारियों और एक रिटायर्ड राजपत्रित अधिकारी की मौजूदगी में होती है। ऑडिट ट्रेल बनाने के लिए हर लेन-देन की जमा रसीद बनाई जाती है। वहीं, चढ़ावे को सुरक्षित रखने से पहले सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त मूल्यांकनकर्ताओं से उनका मूल्यांकन कराया जाता है।