#NewsBytesExplainer: मुंबई हमलों के आतंकियों पर उनकी गैरमौजूदगी में कैसे मुकदमा चलाएगा भारत?
क्या है खबर?
मुंबई आतंकी हमले के करीब 18 साल बाद भारत एक बड़ा कानूनी कदम उठाने जा रहा है। हमले के दोषी 6 आतंकियों के खिलाफ भारत मुकदमा शुरू करेगा। जिन लोगों पर मुकदमा चलेगा, उनमें लश्कर-ए-तैयबा (LeT) प्रमुख हाफिज सईद भी शामिल है। खास बात है कि ये सभी आतंकी भारत में उपस्थित नहीं हैं, ऐसे में इनकी गैरमौजूदगी में ही मुकदमा चलाया जाएगा। आइए जानते हैं ये प्रक्रिया किस तरह होगी।
कदम
विशेष लोक अभियोजक ने दायर की याचिका
विशेष लोक अभियोजक उज्ज्वल निकम ने आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने के लिए विशेष न्यायालय में याचिका दायर की है।
मुंबई पुलिस आयुक्त देवेन भारती ने भी निकम को पत्र लिखकर शीघ्र सुनवाई की मांग की है और तर्क दिया है कि आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं और उनकी अनुपस्थिति के कारण मामले की कार्यवाही अनिश्चित काल तक बाधित नहीं होनी चाहिए।
यह कदम भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 356 के तहत उठाया गया है।
गैरमौजूदगी
भारत में नहीं है हमले के गुनाहगार
मुंबई आतंकी हमलों की योजना बनाने और उसे अंजाम देने में मदद करने के आरोपी कई आतंकवादी पाकिस्तान में छिपे बैठे हैं और उन्हें भारत को प्रत्यर्पित नहीं किया गया है।
हमले के दौरान जिंदा पकड़े गए एकमात्र आतंकी अजमल आमिर कसाब पर भारत में मुकदमा चलाया गया और उसे दोषी ठहराने के बाद 2012 में फांसी दे दी गई।
जांच में हमले के पीछे पाकिस्तान में बैठे संचालकों और साजिशकर्ताओं का हाथ सामने आया है।
आरोपी
किन-किन आरोपियों पर चलेगा मुकदमा?
जिन आरोपियों के खिलाफ मुकदमा शुरू होगा, उनमें LeT प्रमुख हाफिज सईद, लखवी, साजिद मीर, अबू अलकमा, आसिम उर्फ अबू कहफा और मेजर अब्दुर रहमान पाशा के नाम हैं।
हाफिज पर 26/11 हमले की साजिश रचने का आरोप है।
वहीं, लखवी, कहफा और अलकामा ने आतंकवादियों को प्रशिक्षण दिया था। ये सभी सैयद अबू जुंदाल के साथ कराची में बने कंट्रोल रूम में मौजूद थे। अबू जुंदाल ने ही आंतकियों को हिंदी और स्थानीय भाषाएं सिखाई थीं।
प्रक्रिया
आतंकियों की गैरमौजूदगी में कैसे चलेगा मुकदमा?
BNSS की धारा 356 में 'घोषित अपराधी की अनुपस्थिति में जांच, मुकदमा या निर्णय' को लेकर प्रावधान हैं। हालांकि, इसमें किसी व्यक्ति को उसकी भागीदारी के बिना तुरंत दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
अभियुक्त को पहले घोषित अपराधी माना जाना चाहिए और कार्यवाही आगे बढ़ने से पहले कुछ शर्तें भी हैं।
कानून में यह भी जिक्र है कि जानबूझकर अनुपस्थित रहने और गिरफ्तारी से बचने वाला अभियुक्त ऐसा आपराधिक मामले को अनिश्चितकाल तक रोके रखने के लिए नहीं कर सकता।
पहले की शर्तें
मुकदमा शुरू होने से पहले करने होंगे ये काम
आरोपी की अनुपस्थिति में मुकदमा शुरू होने से पहले कई शर्तों को पूरा करना होता है। कोर्ट को कम से कम 30 दिन के अंतराल पर लगातार 2 गिरफ्तारी वारंट जारी करने होते हैं।
आरोपी को पेश होने का मौका देने के लिए एक घोषणा भी जारी की जानी होती है, जिसे अखबारों सहित अन्य माध्यमों से प्रकाशित किया जाता है।
कानूनन आरोप तय होने के 90 दिन बीत जाने के बाद ही मुकदमा शुरू हो सकता है।
आरोपी को सुरक्षा
आरोपी को मिलती है ये सुरक्षा
धारा 356 के तहत, यह प्रावधान भी है कि आरोपी को मुकदमे की कार्यवाही से दूर न रखा जाए।
मुकदमे की जानकारी सार्वजनिक की जानी जरूरी है। आरोपी के आखिरी ज्ञात पते और संबंधित पुलिस थाने के माध्यम से उसे जानकारी दी जाती है। जरूरत पड़ने पर रिश्तेदारों या परिचितों को भी सूचित किया जाना चाहिए।
अगर आरोपी का कोई वकील नहीं है, तो कोर्ट को सरकार के खर्चे पर उसे कानूनी प्रतिनिधित्व देना होगा।
सजा
आतंकी दोषी ठहराए गए तो क्या होगा?
मुकदमा और आरोपियों को दोषी ठहराना या नहीं ये न्यायपालिका का काम है, लेकिन गिरफ्तारी और हिरासत में लेना कानून लागू करने से जुड़ा है।
अगर सभी आरोपियों को उनकी अनुपस्थिति में दोषी ठहराया जाता है, तो भारत के पास उनके खिलाफ एक औपचारिक न्यायिक निर्णय होगा। हालांकि, आरोपियों को भारत लाकर सजा देना उनके ठिकाने, पाकिस्तान के सहयोग, प्रत्यर्पण या अन्य अंतरराष्ट्रीय तंत्रों पर निर्भर करेगा।
यानी केवल दोषी साबित होने से सजा का रास्ता नहीं खुलेगा।