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#NewsBytesExplainer: भारत और ऑस्ट्रेलिया में हुआ यूरेनियम समझौता कितना अहम है?
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम की आपूर्ति को लेकर अहम समझौता हुआ है

#NewsBytesExplainer: भारत और ऑस्ट्रेलिया में हुआ यूरेनियम समझौता कितना अहम है?

लेखन आबिद खान
Jul 09, 2026
05:37 pm

क्या है खबर?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज के साथ बैठक की। इस दौरान दोनों देशों में कई समझौते हुए, जिनमें यूरेनियम और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति के लिए हुआ एक अहम समझौता भी शामिल है। इसके तहत ऑस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम की आपूर्ति करेगा। प्रधानमंत्री ने कहा, "इससे भारत के स्वच्छ ऊर्जा मिशन को मजबूती मिलेगी। हमारा सहयोग रणनीतिक सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण है।" आइए समझौते की अहमियत जानते हैं।

समझौता

क्या है भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच हुआ समझौता?

ऑस्ट्रेलिया ने भारत के परमाणु ऊर्जा उद्योग के लिए यूरेनियम निर्यात करने पर सहमति जताई है। भारत और ऑस्ट्रेलिया ने कहा कि यूरेनियम की बिक्री पूरी तरह से शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। अल्बनीज ने कहा, "इस व्यवस्था से भारत को ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम का निर्यात आसान हो जाएगा, जिससे गैर-जीवाश्म ईंधन वाली बिजली क्षमता का हिस्सा बढ़ाने में मदद मिलेगी और ऑस्ट्रेलियाई संसाधन क्षेत्र के लिए एक अतिरिक्त बाजार भी उपलब्ध होगा।"

अहमियत

भारत के लिए ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम क्यों जरूरी है?

ऊर्जा की भारी मांग से जूझ रहे भारत की नजरें लंबे समय से ऑस्ट्रेलिया के यूरेनियम भंडार पर हैं। ऑस्ट्रेलिया के पास कुल वैश्विक यूरेनियम का लगभग 28 प्रतिशत हिस्सा है और दुनिया का चौथा सबसे बड़ा यूरेनियम उत्पादक देश है। भारत के 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता का पाने और 2070 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को पाने के लिए ये समझौता बेहद अहम है।

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जरूरत

भारत को क्यों है इतने यूरेनियम की जरूरत?

भारत 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा स्थापित करना चाहता है, ताकि 6 करोड़ घरों को बिजली मिल सके। पिछले कुछ सालों में भारत ने स्थापित परमाणु ऊर्जा की मात्रा दोगुनी कर दी है, लेकिन यूरेनियम की आपूर्ति में कमी के चलते यह अभी भी देश की कुल बिजली का केवल 3 प्रतिशत ही है। भारत को परमाणु हथियार बनाने के लिए नहीं, बल्कि बिजली बनाने के लिए यूरेनियम की जरूरत है।

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ऑस्ट्रेलिया

ऑस्ट्रेलिया के साथ यूरेनियम समझौते में परमाणु संधि थी बाधा

ऑस्ट्रेलिया ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर कर रखे हैं। वो केवल अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस को परमाणु शक्ति वाले देशों के रूप में मान्यता देता है और भारत जैसे परमाणु शक्ति वाले गैर-हस्ताक्षरकर्ता देशों को यूरेनियम नहीं बेचता है। 2008 में परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह ने भारत को अपने सदस्य देशों से यूरेनियम खरीदने की अनुमति देते हुए छूट प्रदान की थी। तब से भारत ने यूरेनियम के लिए द्विपक्षीय समझौते किए हैं।

फायदा

समझौते से ये फायदा भी

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अभी आयातित तेल और गैस पर निर्भर है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा सऊदी अरब, इराक, कुवैत और कतर जैसे देशों से आता है। पश्चिम एशिया में तनाव या होर्मुज जलडमरूमध्य में कोई बाधा आने पर ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। परमाणु ऊर्जा का उत्पादन बढ़ने से बिजली उत्पादन के लिए जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता धीरे-धीरे कम होगी।

यूरेनियम

भारत कहां से यूरेनियम खरीदता है?

भारत अपने कुल आयात का लगभग आधा यूरेनियम कजाकिस्तान से खरीदता है। ये भारत का सबसे बड़ा विदेशी यूरेनियम स्त्रोत है। इसके बाद कनाडा से करीब 20-30 प्रतिशत यूरेनियम आयात किया जाता है। 2015 में हुए समझौते के बाद आपूर्ति बढ़ी है। रूस से भी यूरेनियम आयात किया जाता है, जो परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भारत का पुराना सहयोगी है। हालिया सालों में उज्बेकिस्तान से भी आपूर्ति बढ़ी है।

प्लस

अब यूरेनियम के बारे में जानिए

यूरेनियम की खोज साल 1789 में जर्मन रसायन वैज्ञानिक मार्टिन क्लापरोथ ने की थी। इसका नाम यूरेनस ग्रह के नाम पर रखा गया है। माना जाता है कि यूरेनियम का निर्माण लगभग 6.6 अरब साल पहले सुपरनोवा विस्फोटों के दौरान हुआ था। इसका इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में ईंधन के तौर पर किया जाता है। केवल एक किलोग्राम यूरेनियम से 3,000 टन कोयले के बराबर ऊर्जा पैदा की जा सकती है।

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