केन-बेतवा लिंक परियोजना: विकास का दर्द या लाखों की प्यास बुझाने का रास्ता?
भारत की पहली बड़ी नदी-जोड़ परियोजना, 44,605 करोड़ रुपए की केन-बेतवा लिंक परियोजना, मध्य प्रदेश में काफी विरोध का सामना कर रही है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य केन नदी के पानी को बेतवा नदी में भेजना है। इससे 10.62 लाख हेक्टेयर खेती की जमीन की सिंचाई होगी और 62 लाख लोगों को पीने का पानी मिल पाएगा।
हालांकि, इस परियोजना के चलते 1,913 परिवारों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ेगा, जिनमें 648 अनुसूचित जनजाति के परिवार शामिल हैं। यही वजह है कि इसे लेकर लोगों में भारी चिंता है।
जनजातीय कार्यकर्ताओं की मांग, उचित मुआवजा
जनजातीय समूह और सामाजिक कार्यकर्ता इस बात को लेकर परेशान हैं कि उन्हें उचित मुआवजा मिल पाएगा या नहीं और क्या वन अधिकार अधिनियम के तहत उनके हकों की सुरक्षा हो पाएगी। साथ ही, उन्हें जंगलों और वन्यजीवों को होने वाले संभावित नुकसान की भी चिंता सता रही है।
इन मुद्दों को लेकर अमित भटनागर ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी है, वहीं प्रदर्शनकारियों ने 'जल सत्याग्रह' का रास्ता अपनाया है। जनजातीय कार्य मंत्रालय का कहना है कि उसे इस संबंध में कई शिकायतें मिली हैं और उसने इन्हें राज्य के अधिकारियों को सौंप दिया है।
बुंदेलखंड सूखे के बीच केंद्र ने पुनर्वास के फैसले को टाला
केंद्र सरकार का कहना है कि विस्थापित हुए लोगों के पुनर्वास की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है और उन्हें जनजातियों के लिए तय कानूनी सुरक्षा का पूरा पालन करना होगा। इसके बावजूद, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में बार-बार पड़ने वाले सूखे को देखते हुए यह परियोजना लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है। यह विकास और स्थानीय लोगों की आवाज के बीच संतुलन बनाने की एक कठिन चुनौती है।