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#NewsBytesExplainer: धार भोजशाला को लेकर क्या है विवाद? जानें 1034 ईस्वी से अब तक की कहानी
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाल को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्ष के अलग-अलग दावे हैं

#NewsBytesExplainer: धार भोजशाला को लेकर क्या है विवाद? जानें 1034 ईस्वी से अब तक की कहानी

लेखन आबिद खान
Jan 22, 2026
06:00 pm

क्या है खबर?

मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला फिर सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हिंदू सुबह से दोपहर 12 बजे तक भोजशाला में पूजा करेंगे और इसके बाद मुस्लिम पक्ष नमाज पढ़ेगा। शाम में हिंदुओं को फिर से पूजा की अनुमति मिली है। जब भी बसंत पंचमी और शुक्रवार एक साथ होता है, तब भोजशाला में विवाद की स्थिति बनती है। आइए आज भोजशाला का इतिहास जानते हैं।

शुरुआत

क्या है भोजशाला का इतिहास?

भोजशाला के इतिहास की शुरुआत 11वीं शताब्दी से होती है। परमार वंश के शासक राजा भोज ने साल 1034 ईस्वी में धार को शिक्षा और संस्कृति का केंद्र बनाने के लिए सरस्वती सदन की स्थापना की। इसे ही भोजशाला कहा जाता है। यह एक आवासीय संस्कृत विश्वविद्यालय था, जिसे नालंदा और तक्षशिला जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों की तरह बनाया गया था। माघ, बाणभट्ट, कालिदास, भास्कर भट्ट समेत कई विद्वानों ने यहां शिक्षा ग्रहण की।

इमारत

भोजशाला परिसर में क्या-क्या है?

परिसर में एक बड़ा खुला आंगन है, जिसके चारों ओर स्तंभों से बना एक बरामदा और पीछे पश्चिम में एक प्रार्थना घर है । खंभों, दीवारों और छतों पर संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख हैं। इनमें व्याकरण के सूत्र, काल, नाट्यशास्त्र से जुड़े अंश और देवी-देवताओं की मूर्तियां देखी जा सकती हैं। बीचों बीच एक बड़ा सा कुंड है। राजा भोज की मृत्यु के 200 साल बाद तक यहां अध्ययन का काम चलता रहा।

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जानकारी

सरस्वती की मूर्ति लंदन ले गए ब्रिटिश अधिकारी

राजा भोज ने यहां देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापित कराई थी। ब्रिटिश शासन के दौरान हुए एक सर्वे में ये मूर्ति मिलने का उल्लेख है। 1857 में एक अंग्रेज अधिकारी मूर्ति लंदन ले गए। कहा जाता है कि ये मूर्ति अभी भी संग्रहालय में है।

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आक्रमण

खिलजी के आक्रमण के बाद बदली स्थिति

1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर हमला किया और परमार शासन का अंत हुआ। इसके बाद भोजशाला के स्वरूप को बदलने की कोशिशें शुरू हुईं। कहा जाता है कि 1514 ईस्वी में महमूद शाह खिलजी द्वितीय ने भोजशाला परिसर को बदलने का प्रयास किया। परिसर के पास सूफी संत कमाल मौलाना की दरगाह बनाई गई। हालांकि, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह स्थान लंबे समय से कमाल मौला मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होता रहा है।

आजादी

आजादी के बाद भोजशाला को लेकर क्या-क्या हुआ?

1936 से 1942 के बीच नमाज और पूजा को लेकर यहां कई विवाद हुए। स्वतंत्रता के बाद 1952 में भोजशाला को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को सौंप दिया गया। इस दौरान लंबे समय तक धार्मिक गतिविधियों पर प्रतिबंध रहा। 1995 के बाद इसे दोबारा खोलने की मांग बढ़ी। इसके बाद मंगलवार को पूजा और शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई। 12 मई, 1997 को भोजशाला में आम लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

वर्तमान स्थिति

फिलहाल क्या है स्थिति?

2003 में हिंदू पक्ष को मंगलवार को पूजा करने की अनुमति दी गई। पर्यटकों के लिए भी भोजशाला को खोला गया। तय हुआ कि मंगलवार को हिंदू पूजा करेंगे। इसके अलावा बसंत पंचमी पर पूरे दिन पूजा करने की अनुमति होगी। वहीं, शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष जुमे की नमाज अदा करेगा। बाकी दिन भोजशाला में पर्यटक भी जा सकेंगे। ये व्यवस्था आज भी लागू है, लेकिन जब बसंत पंचमी शुक्रवार के दिन आती है, तो तनाव बढ़ जाता है।

कोर्ट

कोर्ट ने फिलहाल किस मामले पर फैसला सुनाया है?

23 जनवरी को बसंत पंचमी और शुक्रवार साथ है। हिंदू पक्ष ने इस पूरे दिन सरस्वती पूजा की अनुमति के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसी याचिका पर फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि हिंदू पक्ष सुबह से दोपहर 12 बजे तक पूजा करे सकेगा। इसके बाद दोपहर 1 से 3 बजे तक मुस्लिम पक्ष नमाज अदा करेगा। शाम को फिर हिंदू पक्ष को पूजा करने की अनुमति होगी।

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