
कोर्ट-केसों से लेकर मंदिर-मस्जिद विवाद तक, जानें सदियों पुराने अयोध्या विवाद का पूरा इतिहास
क्या है खबर?
देश के सबसे बड़े और पुराने जमीन विवादों में शामिल अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है।
विवादित जमीन को मंदिर निर्माण के लिए एक ट्रस्ट को दिया जाएगा, वहीं मस्जिद निर्माण के लिए उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड को एक अलग जगह पर पांच एकड़ जमीन दी जाएगी।
इस फैसले पर देश ही नहीं पूरी दुनिया की नजर थी।
आइए आपको ये पूरा विवाद एक बार फिर से समझा देते हैं।
मस्जिद निर्माण
बाबर के आदेश पर मीर बाकी ने 16वीं सदी में बनवाई मस्जिद
सरकारी दस्तावेजों और शिलालेखों के अनुसार, अयोध्या में विवादित स्थल पर 1528 से 1530 के बीच मुगल बादशाह बाबर के आदेश पर उसके गवर्नर मीर बाकी ने एक मस्जिद बनवाई थी, जिसे आमतौर पर बाबरी मस्जिद कहते हैं।
लेकिन इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी।
हालांकि, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) के सर्वे में विवादित जगह पर पहले गैर-इस्लामिक ढांचा होने की बात कही गई है।
विवाद की शुरूआत
राम मंदिर नहीं बल्कि दूसरे मंदिर की वजह से शुरू हुआ विवाद
दिलचस्प बात ये है कि बाबरी मस्जिद पर झगड़े की शुरूआत राम मंदिर नहीं बल्कि किसी अन्य मंदिर को लेकर हुई थी।
दरअसल, 1855 में नवाबी शासन के दौरान कुछ मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद से कुछ 100 मीटर दूर अयोध्या के सबसे प्रतिष्ठित हनुमानगढ़ी मंदिर पर कब्जे के लिए धावा बोल दिया।
हमला करने वाले मुसलमानों का दावा था कि एक मस्जिद तोड़कर ये मंदिर बनाया गया था, यानि अयोध्या विवाद के बिल्कुल विपरीत मामला।
इतिहास से
हिंदू वैरागियों ने हमलावरों को खदेड़ा
हनुमानगढ़ी मंदिर पर हिंदू वैरागियों और मुस्लिमों के बीच खूनी संघर्ष हुआ और वैरागियों ने हमलवारों को वहां से खदेड़ दिया। अपनी जान बचाने के लिए हमलावर बाबरी मस्जिद में जा छिपे, लेकिन वैरागियों ने मस्जिद में घुसकर उनका कत्ल कर दिया।
चबूतरा निर्माण
1857 के बाद वैरागियों ने बनाया चबूतरा
इस बीच 1857 के बाद अवध में नवाब का राज खत्म हो गया और ये सीधे ब्रिटिश प्रशासन के अंतर्गत आ गया।
माना जाता है कि इसी दौरान वैरागियों ने मस्जिद के बाहरी हिस्से में चबूतरा बना लिया और वहां भगवान राम की पूजा करने लगे।
प्रशासन से जब इसकी शिकायत की गई तो उन्होंने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए चबूतरे और बाबरी मस्जिद के बीच एक दीवार बना दी, लेकिन दोनों का मुख्य दरवाजा एक ही रहा।
पहला केस
1885 में दाखिल किया गया पहला केस
अयोध्या विवाद में मुकदमेबाजी की शुरूआती होती है 1885 में।
29 जनवरी, 1885 को निर्मोही अखाड़ा के महंत रघुबर दास ने सिविल कोर्ट में केस दायर करते हुए 17X21 फुट लम्बे-चौड़े चबूतरे को भगवान राम का जन्मस्थान बताया और वहां मंदिर बनाने की अनुमति मांगी। उन्हें खुद को चबूतरे वाली जमीन का मालिक बताया।
पहले सिविल कोर्ट, फिर जिला कोर्ट और फिर अवध के जुडिशियल कमिश्नर की कोर्ट, तीनों ने वहां मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दी।
दावा
राम चबूतरे के राम जन्मस्थान होने का था दावा
हालांकि, तीनों कोर्ट ने अपनी सुनवाई के दौरान राम चबूतरे को हिंदुओं की आस्था का प्रतीक माना, लेकिन जमीन के मालिकाना हक के सबूत न होने और शांति बनाए रखने के लिए मंदिर बनाने की इजाजत नहीं दी।
यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि हिंदू राम चबूतरे को भगवान राम का जन्मस्थान बता रहे हैं और वहीं पर मंदिर बनाने की अनुमति मांग रहे हैं।
मस्जिद की मुख्य इमारत पर अभी तक कोई दावा नहीं किया गया था।
जानकारी
1949 में मस्जिद में बंद हुई नमाज
इसके बाद आजादी के समय हिंदू-मुस्लिम तनाव का असर अयोध्या पर भी पड़ा और हिंद वैरागी वहां नमाज पढ़ने आने वाले मुस्लिमों को परेशान करने लगे। 1949 में वहां केवल शुक्रवार की नमाज हो रही थी और वो भी कुछ समय बाद बंद हो गई।
मुख्य इमारत पर दावा
दिसंबर 1949 में मुख्य इमारत में रखी गई मूर्तियां
बाबरी मस्जिद की मुख्य इमारत पर दावे की कहानी 1949 से शुरू होती है।
22-23 दिसंबर 1949 की रात को अभय रामदास और उसके साथियों ने मस्जिद की दीवार कूदकर उसके अंदर भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां रख दीं।
मूर्ति रखने के बाद ये प्रचार किया गया कि अपने जन्मस्थान पर कब्जा करने के लिए भगवान राम खुद प्रकट हुए हैं।
इस योजना को फैजाबाद डिप्टी कमिश्नर केके नायर और अन्य अधिकारियों का सहयोग प्राप्त था।
मस्जिद पर ताजा
कोर्ट ने लगाई स्टे, मस्जिद पर लगा ताला
नायर ने अगली सुबह मस्जिद में हुए अतिक्रमण को हटवाने की कोशिश नहीं की, बल्कि बागी तेवरों में सरकार को लिखा कि अगर मस्जिद से मूर्तियां हटवानी हैं तो उनका तबादला कर दें।
नायर बाद में जनसंघ की टिकट से लोकसभा चुनाव लड़े और जीते थे।
इस बीच मामला फिर से कोर्ट में पहुंच गया और 16 जनवरी, 1950 को सिविल जज ने विवादित स्थल पर स्टे लगा दी और मस्जिद के गेट पर ताला लग गया।
राजनीति
राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति और राम आंदोलन ने विवाद को बढ़ाया
1980 के दशक में भाजपा और विश्व हिंदू परिषद (VHP) के राम मंदिर आंदोलन और राजीव गांधी की अनाड़ी राजनीति ने इस विवाद को ऐसा रंग दिया जिसका असर आज भी दिखता है।
VHP और भाजपा के दबाव के बीच हिंदूओं को अपनी तरफ करने की चाह में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव ने एक वकील के जरिए फैजाबाद जिला कोर्ट में मंदिर का ताला खुलवाने की अर्जी डलवाई और जिला जज केएम पांडे ने ताला खोलने का आदेश जारी कर दिया।
जानकारी
एक घंटे के अंदर खोल दिया गया ताला
फैजाबाद कोर्ट के आदेश के घंटे भर के भीतर मस्जिद के गेट पर लटका ताला खोल दिया गया और दूरदर्शन पर इसके समाचार का प्रसारण भी किया गया। इससे ये बात पुख्ता हुई कि ये सब पहले से प्रयोजित था।
आदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने पास मंगाए विवाद से जुड़े सारे केस
इस बीच 1950-61 के बीच फैजाबाद कोर्ट में विवाद को लेकर चार केस दायर किए जा चुके थे, जिन पर सुनवाई चल रही थी।
10 जुलाई, 1989 को उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ये चारों केस अपने पास मंगाने का आदेश जारी किया।
हाई कोर्ट ने 14 अगस्त को विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश भी दिया, लेकिन इस आदेश की उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार ने समय-समय पर धज्जियां उड़ाईं।
जानकारी
6 दिसंबर, 1992 को ढहाई गई बाबरी मस्जिद
इस दौरान VHP का राम मंदिर आंदोलन चलता रहा और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली। इन आंदोलनों के दौरान कारसेवक अयोध्या पहुंचते रहे और 6 दिसंबर, 1992 को उन्होंने बाबरी मस्जिद ढहा दी।
हाई कोर्ट फैसला
हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटा
विवाद पर दो दशक से अधिक समय तक सुनवाई करने के बाद 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया।
अपने फैसले में हाई कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन को निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड उत्तर प्रदेश और रामलला विराजमान के बीच तीन बराबर हिस्सों में बांट दिया था।
हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ इन तीनों और अन्य कुछ पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की थी।
जानकारी
सुप्रीम कोर्ट ने लगातार 40 दिन की सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता के जरिए भी मामले की समाधान की कोशिश की लेकिन ये असफल रहा, जिसके बाद पांच सदस्यीय बेंच ने 5 अगस्त से रोजाना सुनवाई की। 40 दिन की सुनवाई के बाद कोर्ट ने 16 अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रखा था।