शाहीन बाग में कब्र की सुरक्षा पर दिल्ली कोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- कब्रिस्तान सबके लिए
दिल्ली की एक अदालत ने शाहीन बाग के कब्रिस्तान में एक महिला की कब्र को सुरक्षा देने की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक कब्रिस्तान पूरे समाज के लिए होते हैं, न कि किसी एक परिवार के लिए। याचिकाकर्ता एम बशारत हुसैन ने दलील दी थी कि इस्लामी कानून कब्र को तब तक नहीं छेड़ने की बात कहता है, जब तक शव पूरी तरह से गल न जाए। हालांकि, अदालत ने महसूस किया कि किसी एक कब्र को विशेष सुरक्षा देना दूसरों के लिए एक गलत मिसाल बन जाएगा।
कोर्ट ने सीमित जगह और दोबारा इस्तेमाल की जरूरत का हवाला दिया
न्यायाधीश ने बताया कि कब्रिस्तान में जगह की कमी है, इसलिए कब्रों का दोबारा इस्तेमाल करना जरूरी है। कब्रिस्तान के प्रबंधकों ने भी कहा कि सार्वजनिक जमीन पर कोई भी व्यक्ति स्थायी अधिकार का दावा नहीं कर सकता। बशारत हुसैन यह साबित नहीं कर पाए कि उनकी पत्नी का शरीर अभी तक पूरी तरह से मिट्टी में नहीं मिला है। फिर भी, अगर वह अपनी पत्नी की कब्र के लिए लड़ाई जारी रखना चाहते हैं, तो मुकदमे के दौरान सबूत पेश कर सकते हैं।