पहाड़ों की कटाई से असम में 'जल प्रलय', IIT ने दिया जंगल बचाने का मंत्र
असम में साल 2026 में आई बाढ़ ने शिवसागर, चराईदेव और जोरहाट जैसे कई इलाकों में भारी तबाही मचाई। इस बाढ़ को और भी भयावह बनाने का काम नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों पर बड़े पैमाने पर हुई वनों की कटाई और माइनिंग ने किया।
दरअसल, जब जोरदार बारिश हुई, तो पेड़ों के बिना नंगी पड़ी ये ढलानें न तो पानी रोक पाईं और न ही मिट्टी। नतीजा यह हुआ कि सारा पानी तेज़ी से बहकर असम की नदियों में आ गया, जिससे पहले से ही कमजोर तटबंध टूट गए या पानी से भर गए।
IIT गुवाहाटी के जलविज्ञानी ने जंगल बहाली की अपील की
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में बाढ़ जैसी आपदाओं से बचने के लिए ऊपरी इलाकों में जंगलों को फिर से हरा-भरा करना बेहद जरूरी है। IIT गुवाहाटी के जलविज्ञानी प्रोफेसर अरुप कुमार सरमा ने बताया कि पहाड़ियों की पानी सोखने की क्षमता बढ़ाने के लिए 'इकोलॉजिकल मैनेजमेंट प्रैक्टिसेज' अपनाई जा सकती हैं।
इन तरीकों में योजनाबद्ध तरीके से पेड़-पौधे लगाना और बारिश के पानी का संग्रह करना शामिल है। गुवाहाटी के नजदीक एक पायलट प्रोजेक्ट में, इन उपायों के कारण एक सूखा पड़ा कुआं दोबारा पानी से लबालब हो गया। हालांकि, जमीनी स्तर पर बड़ा बदलाव लाने के लिए असम और उसके पड़ोसी राज्यों को मिलकर काम करना होगा। उन्हें अगली किसी बड़ी आपदा से पहले ही ज़मीन के टिकाऊ इस्तेमाल के तरीकों को अपनाना चाहिए।