आशा भोसले प्लेबैक की दुनिया से निकलकर कैसे बनीं भारत की पहली 'इंडीपॉप क्वीन'?
क्या है खबर?
भारतीय संगीत जगत में सुरों की जादूगरनी आशा भोसले ने जहां एक तरफ शास्त्रीय और फिल्मी गीतों में अपनी महारत साबित की, वहीं दूसरी तरफ पारंपरिक गायकी की सीमाओं को तोड़कर 'इंडीपॉप' की दुनिया में कदम रखा। अपनी आवाज में वो खास नजाकत और जोश भरकर उन्होंने न केवल खुद को हर दौर के अनुकूल ढाला, बल्कि वो भारत की पहली असली पॉप आइकन बनकर उभरीं। आइए जानें कैसे एक प्लेबैक गायिका ने ग्लोबल म्यूजिक चार्ट्स पर अपनी धाक जमाई।
बदलाव
जब 90 के दशक में 'पॉप आइकन' बनकर उभरीं आशा ताई
अक्सर लोग आशा को बॉलीवुड की 'प्लेबैक क्वीन' के रूप में जानते हैं, लेकिन उनके करियर का एक पहलू उनकी जीवंतता दिखाता है। 90 के दशक में जब ज्यादातर गायक रिटायरमेंट की ओर बढ़ रहे थे, तब उन्होंने नई पारी शुरू की। खुद को 'पॉप आइकन' के रूप में स्थापित करते हुए 'जानम समझा करो' जैसे एलबम से उन्होंने हलचल मचा दी। शास्त्रीय संगीत से लेकर इंडीपॉप के मॉडर्न बीट्स तक, उनका ये बदलाव युवाओं के लिए बड़ी प्रेरणा बना।
कामयाबी
बिना फिल्मों के भी संगीत को दी नई ऊंचाइयां
जब 'इंडीपॉप' की लहर आई तो आशा पीछे नहीं हटीं, बल्कि उन्होंने इसमें कदम रखा। उन्होंने दिखा दिया कि वो सिर्फ 60 और 70 के दशक के कैबरे गानों (जैसे 'पिया तू अब तो आजा') या 80 के दशक की गजलों तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने बिना किसी फिल्म के सहारे स्वतंत्र संगीत को ऊंचाइयों पर पहुंचाया। यही वजह है कि आज शाहरुख खान से लेकर अनुष्का शर्मा तक, हर पीढ़ी के सितारे उन्हें अपना आदर्श मान रहे हैं।
उपलब्धि
...जब 60 की उम्र में आशा ताई ने जीता MTV अवाॅर्ड
साल 1997 में आशा ने संगीतकार लेस्ली लुईस संग अपना प्राइवेट इंडीपॉप एल्बम 'जानम समझा करो' निकाला। ये एल्बम इतना बड़ा हिट हुआ कि इसने उन्हें उस साल का MTV अवॉर्ड दिलाया। 60 के दशक के मध्य में खड़ी एक महिला, मंच पर अपनी आधी उम्र के कलाकारों के साथ न केवल मुकाबला कर रही थी, बल्कि उन्हें पछाड़कर जीत हासिल कर रही थीं। यही वो दौर था, जब 'आशा ताई' हर घर में युवाओं की धड़कन बन गई थीं।
संघर्ष
ठुकराए गानों से पॉप क्वीन तक
पिता के निधन के बाद परिवार के सहारे के लिए आशा ने बचपन में गाना शुरू किया। शुरुआत में उन्हें दूसरों के ठुकराए हुए गाने मिलते थे, लेकिन उन्होंने मेहनत से उन्हीं को अपनी पहचान बना लिया। 60-70 के दशक में वो हेलन की आवाज बनीं और 'पिया तू' जैसे गानों से बॉलीवुड को नया अंदाज दिया। आरडी बर्मन संग मिलकर उन्होंने नए प्रयोग किए। इसके बाद गजल, शास्त्रीय और 90 के दशक में पॉप संगीत में महारत हासिल की।
एल्बम
वो एल्बम, जिन्होंने आशा को बनाया 'पॉप स्टार'
साल 1997 में आशा के एल्बम 'जानम समझा करो' ने साबित किया कि उनकी आवाज पॉप संगीत को नई ऊंचाई दे सकती है। फिर आशा 'कभी तो नजर मिलाओ' लाईं। अदनान सामी संग उनकी जुगलबंदी आज भी शादियों और प्लेलिस्ट की शान है। 'राहुल एंड आई' से उन्होंने आरडी बर्मन को श्रद्धांजलि देते हुए रिमिक्स से नई पीढ़ी को उनके संगीत से जोड़ा, वहीं 'आपकी आशा' के 'ना मरते हम' जैसे गानों ने उनके पॉप का आत्मीय पहलू पेश किया।