निवेश के प्रमाण को हल्के में लेना क्यों पड़ सकता है भारी?
क्या है खबर?
हर साल नौकरी करने वाले लोगों से कंपनी निवेश से जुड़े प्रमाण मांगती है, लेकिन कई लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं। कोई भूल जाता है, कोई टाल देता है और कुछ लोग सोचते हैं कि बाद में आयकर रिटर्न भरते समय सब ठीक कर लेंगे। यही सोच आगे चलकर परेशानी की वजह बनती है। निवेश के प्रमाण केवल औपचारिकता नहीं हैं, बल्कि इन्हीं से तय होता है कि आपकी सैलरी से कितना कर कटेगा।
परेशानी
प्रमाण जमा नहीं करने पर क्या परेशानी आती है?
साल की शुरुआत में कर्मचारी बताते हैं कि वे कर बचाने के लिए कहां-कहां निवेश करेंगे और कितना पैसा लगाएंगे। इसी जानकारी के आधार पर हर महीने कर काटा जाता है। हालांकि, जब तय समय तक प्रमाण जमा नहीं होते, तो कंपनी मान लेती है कि कोई निवेश नहीं हुआ है। इसके बाद कर की कटौती बढ़ जाती है। कई बार साल के आखिरी महीनों में सैलरी अचानक कम हो जाती है, जिससे लोगों को झटका लगता है।
रिटर्न
बाद में रिटर्न में छूट लेना क्यों मुश्किल हो जाता है?
कुछ लोग सोचते हैं कि वे आयकर रिटर्न भरते समय सीधे छूट ले लेंगे और समस्या खत्म हो जाएगी। ऐसा किया जा सकता है, लेकिन इसमें दिक्कतें होती हैं। जो अतिरिक्त कर पहले कट चुका होता है, वह तुरंत वापस नहीं मिलता। वह पैसा बाद में रिफंड के रूप में आता है, जिसमें कई बार ज्यादा समय लगता है। इसके साथ ही, अगर फॉर्म-16 में छूट नहीं दिखती और रिटर्न में दिखती है, तो कर विभाग सवाल पूछ सकता है।
तरीका
इस परेशानी से बचने का आसान तरीका
इस झंझट से बचने का आसान तरीका समय पर सही निवेश प्रमाण जमा करना और जानकारी अपडेट रखना है। आपने जितना निवेश किया है, उतनी ही जानकारी दें। किराए की रसीद, बीमा प्रीमियम, घर के कर्ज का ब्याज जैसे सभी कागज हर साल जमा करना जरूरी है। यह काम भले ही उबाऊ और समय लेने वाला लगे, लेकिन इससे सैलरी में अचानक कटौती, पैसों की कमी और कर से जुड़ी नोटिस जैसी परेशानियों से आसानी से बचा जा सकता है।