कच्चे तेल में गिरावट के बाद आई स्थिरता, जानिए क्या है कारण
कच्चे तेल की कीमतें हाल ही में 9 प्रतिशत से ज्यादा गिरने के बाद एक बार फिर स्थिर हो गई हैं। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर (करीब 9,500 रुपये) से ऊपर बना हुआ है, वहीं वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) करीब 96 डॉलर पर कारोबार कर रहा है।
यह स्थिरता तब देखने को मिली, जब सऊदी अरब ने अपने तेल निर्यात का रास्ता बदलकर उसे होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए फिर से भेजना शुरू किया। दरअसल, एक पाइपलाइन बंद होने के बाद सभी को तेल आपूर्ति की कमी की चिंता सता रही थी।
राजनीतिक प्रयासों से भी बाजार शांत
यह स्थिरता केवल सऊदी अरब के फौरन उठाए गए कदम की वजह से ही नहीं आई। इसके पीछे एक बड़ी कूटनीति भी काम कर रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान संयुक्त राष्ट्र महासभा में मिल सकते हैं।
उनकी इस संभावित मुलाकात ने बाजार में छाई घबराहट को काफी हद तक शांत किया है। इसी दौरान, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम ने हूती खतरों के खिलाफ सऊदी अरब को अपना समर्थन दिया। यह साफ दिखाता है कि कैसे वैश्विक राजनीति हमारी ऊर्जा की कीमतों पर सीधा असर डाल रही है।
ऊर्जा की कीमतों में 60 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी
इस स्थिरता के बावजूद ऊर्जा की कीमतें इस साल 60 प्रतिशत से भी ज्यादा बढ़ गई हैं। इसकी मुख्य वजह पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य शिपिंग मार्गों में आई बाधाएं और रूस-यूक्रेन युद्ध से ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को पहुंचा नुकसान है।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व और इजरायल-ईरान के बीच बढ़ता तनाव अब भी बाजारों में अनिश्चितता बनाए हुए हैं। हालात सुधारने के लिए अमेरिका ने प्रभावित इलाकों के पुनर्निर्माण के लिए 5 अरब डॉलर (करीब 475 अरब रुपये) का फंड देने का प्रस्ताव रखा है।
इसके अलावा, फेड ने इन बढ़ती लागतों से पैदा हुई महंगाई से मुकाबला करने के लिए ब्याज दरें भी बढ़ा दी हैं।