कभी 2,100 अरब रुपये की थी बायजूस, कैसे मुश्किलों में घिर गया रवींद्रन का एडटेक साम्राज्य?
क्या है खबर?
भारत की बड़ी एडटेक कंपनी बायजूस और उसके संस्थापक बायजू रवींद्रन एक बार फिर चर्चा में हैं। कभी देश के सबसे सफल स्टार्टअप्स में गिनी जाने वाली कंपनी आज मुश्किल दौर से गुजर रही है। हाल में सिंगापुर की अदालत ने रवींद्रन को अवमानना मामले में 6 महीने की सजा सुनाई। इसके बाद कंपनी की तेजी से शुरू हुई सफलता और फिर आई बड़ी गिरावट पर फिर से लोगों की नजर टिक गई है।
शुरुआत
छोटी शुरुआत से बड़ी सफलता तक
केरलम के रहने वाले रवींद्रन पहले गणित पढ़ाते थे। साल 2011 में उन्होंने कंपनी की शुरुआत की और इसके बाद 2015 में बायजूस ऐप लॉन्च हुआ। ऑनलाइन पढ़ाई की बढ़ती मांग के बीच कंपनी को बड़ा निवेश मिला और साल 2018 में कंपनी यूनिकॉर्न बनी। मार्च, 2022 तक कंपनी की कीमत करीब 22 अरब डॉलर (लगभग 2,100 अरब रुपये) पहुंच गई। उस दौर में बायजूस भारत की सबसे बड़ी और चर्चित एडटेक कंपनियों में शामिल हो गई थी।
तेजी
महामारी में तेजी से बढ़ा कारोबार
कोरोना महामारी के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई की मांग बहुत बढ़ गई। इसी समय कंपनी ने तेजी से विस्तार किया और कई बड़ी खरीदारी की। व्हाइटहैट जूनियर को करीब 300 करोड़ रुपये में और आकाश को करीब 95 अरब रुपये में खरीदा गया। कंपनी ने भारत के साथ विदेशों में भी कारोबार बढ़ाया। बड़े निवेशकों ने पैसा लगाया और कंपनी का नाम तेजी से आगे आया। उस समय रवींद्रन देश के बड़े कारोबारियों में गिने जाने लगे थे।
परेशानियां
फिर धीरे-धीरे बढ़ने लगी परेशानी
साल 2022 के बाद हालात बदलने लगे। स्कूल दोबारा खुलने से ऑनलाइन पढ़ाई की मांग कम होने लगी। कंपनी पर खर्च और कर्ज दोनों बढ़ते गए। वित्तीय नतीजों में देरी हुई और निवेशकों की चिंता भी बढ़ने लगी। अमेरिका में 1.2 अरब डॉलर (लगभग 115 अरब रुपये) के कर्ज को लेकर कानूनी विवाद शुरू हुआ। कई जगह कंपनी की जांच हुई। कर्मचारियों की छंटनी और कारोबार में दबाव की खबरों ने भी कंपनी की मुश्किलें लगातार बढ़ा दीं।
मुश्किल दौर
अब मुश्किल दौर में कंपनी
अब कंपनी कई देशों में कानूनी मामलों और आर्थिक दबाव का सामना कर रही है। कुछ निवेशकों ने कंपनी की कीमत काफी कम कर दी है। भारत में भी कई मामले चल रहे हैं। हाल में सिंगापुर कोर्ट का फैसला सामने आने के बाद चर्चा और तेज हो गई। जिसे कभी भारत की सबसे बड़ी स्टार्टअप सफलता माना जाता था, उसे अब तेज विस्तार और कमजोर व्यवस्था से जुड़े बड़े उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है।