केबिन की हवा को कैसे ठीक करता है एयर फिल्टर? जानिए कब बदलना जरूरी
क्या है खबर?
ज्यादातर लोगों को लगता है कि कार के दरवाजे बंद करते ही वे बाहर के वायु प्रदूषण से छुटकारा पा लेते हैं, लेकिन कई बार गाड़ी के अंदर की हवा बाहर जितनी ही प्रदूषित हो सकती है। जब भी आप सड़क पर होते हैं तो गाड़ी बाहर की प्रदूषकों से भरी हवा को अंदर खींचती है। केबिन एयर फिल्टर इन हानिकारक कणों को अंदर आने से रोकते हैं। आइये जानते हैं एयर फिल्टर कैसे काम करते हैं।
काम
यह काम करता है फिल्टर
केबिन एयर फिल्टर एक छोटा उपकरण है, जो ज्यादातर ग्लव बॉक्स के पीछे या डैशबोर्ड के नीचे पाया जाता है। इसका उद्देश्य कार में प्रवेश करने से पहले धूल, पराग, धुंध और अन्य कणों को रोकना है। कुछ गुणवत्ता वाले फिल्टर हानिकारक गंध और गैसों को भी केबिन में आने से रोकते हैं। बाहर की हवा फिल्टर से होकर बहती है, जिसके बाद यह केबिन के भीतर घूमती है और यात्रियों को स्वच्छ हवा प्रदान करती है।
चयन
कौनसा एयर फिल्टर चुनें?
केबिन एयर फिल्टर आपकी कार में धूल, पराग और कुछ प्रदूषकों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पराग या धूल जैसे बड़े कणों को अधिकांश मानक फिल्टर हटा सकते हैं। महीन धूल और एलर्जी पैदा करने वाले तत्वों को रोकने में उच्च-दक्षता वाले फिल्टर (HEPA फिल्टर) सहायक होते हैं। एयर रीसर्कुलेशन मोड, ट्रैफिक के दौरान खिड़कियां बंद रखने और केबिन की नियमित सफाई करने से भी कार में स्वच्छ हवा मिलती है।
कब बदलें
कब बदलना चाहिए फिल्टर?
केबिन एयर फिल्टर समय के साथ धीरे-धीरे हवा साफ करने की अपनी क्षमता खो देते हैं और धूल, धुआं और प्रदूषक जमा करते हैं। सामान्य ड्राइविंग परिस्थितियों में ज्यादातर कार निर्माता सलाह देते हैं कि एयर फिल्टर को 10,000-15,000 किलोमीटर की यात्रा या एक साल में बदल देना चाहिए। अगर आप दिल्ली, गुरूग्राम, मुंबई या कोलकाता जैसे ज्यादा वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) वाले शहर में रहते हैं तो 6-8 महीने में बदलना सही रहेगा।
संकेत
खराबी के मिलते हैं ये संकेत
अगर, कार का AC सही तरह से काम नहीं कर रहा और हवा का प्रवाह कम है तो यह एयर फिल्टर में खराबी का संकेत देता हैं। साथ ही बदबूदार केबिन या दुर्गंध आना, एयर वेंट के आस-पास धूल का जमाव या खिड़कियों के पास धुंध का बढ़ना भी इसी तरफ इशारा करता है। अवरुद्ध फिल्टर AC और वेंटिलेशन को अधिक मेहनत करने पर मजबूर करेगा, जिससे कूलिंग दक्षता कम हो जाएगी और ईंधन की खपत में भी वृद्धि होगी।