150 रुपये में बर्तन धोते थे ऋषिकांता सिंह, अब राष्ट्रमंडल खेलों में जीता रजत पदक
क्या है खबर?
राष्ट्रमंडल खेल 2026 में भारत को दूसरा पदक भारोत्तोलन में ऋषिकांता सिंह ने दिलाया। उन्होंने रजत पदक पर कब्जा जमाया। ऋषिकांता पदक जीतने के बाद भारतीय दल के भोजन कक्ष में पहुंचे और उन्हें रसोई कर्मचारियों को देखकर अपने बचपन की याद आ गई। 11 साल की उम्र में वह मणिपुर के इंफाल में नगाइहाकतांग माखा मणिंग लीकाई गांक के पास ढाबे में काम करते थे। उन्हें 150 रुपये मिलते थे। ऐसे में आइए उनकी कहानी जानते हैं।
सफर
परिवार के लिए खाने की व्यवस्था हो सके इसलिए करना पड़ता था काम
ऋषिकांता का बचपन बर्तन धोने, पानी की बाल्टियां ढोने और शाम का समय निर्माण स्थलों पर काम करते हुए बीता।
वह यह सब इसलिए करते थे, ताकि उनके परिवार के लिए खाने की व्यवस्था हो सके।
अपनी इस उपलब्धि के कुछ घंटे बाद भारतीय नौसेना के पेटी ऑफिसर ऋषिकांता उन दिनों को याद करते नजर आए, जिन्होंने उनके जीवन को आकार दिया।
उनके संघर्ष भरे बचपन के इन्हीं अनुभवों ने उन्हें मजबूत बनाया और उनकी जिंदगी पर गहरा प्रभाव डाला।
बयान
दिन में एक वक्त का खाना खा पाता था ऋषिकांता का परिवार
ऋषिकांता ने कहा, "बचपन में खेलों से जुड़ने से पहले मैं स्थानीय ढाबे में सहायक के तौर पर काम करता था। बर्तन धोने और पानी ढोने के साथ-साथ परिवार की अतिरिक्त जरूरतों को पूरा करने के लिए निर्माण स्थलों पर भी काम करता था। मेरे पिता टैक्सी चलाते थे और हमारी हालत इतनी खराब थी कि हम दिन में केवल एक वक्त का खाना खाते थे। मां बिना सब्जी के चावल या गेहूं के आटे की गोलियां बनाती थीं।"
इंटरव्यू
3 महीने तक किया 150 रुपये पर काम
इंडियन एक्सप्रेस से उन्होंने आगे कहा, "3 महीने से अधिक समय तक परिवार की मदद के लिए रोजाना 150 रुपये में मैंने काम किया। ग्लासगो में रजत पदक जेब में रखकर रात का खाना खाते समय रसोई कर्मचारियों को काम करते देख मुझे मेरे अपने पुराने दिन याद आ गए।"
भावुक ऋषिकांता ने कहा कि यह पदक उनके जैसे उन लोगों के लिए है, जिन्हें कोई सहारा नहीं मिला और परिवार की जिम्मेदारी उठाने में योगदान देना पड़ा।
उम्र
12 साल में ऋषिकांता ने खेलना शुरू किया
एक गांव के मेले में एक खेल शिक्षक की नजर दुबले-पतले ऋषिकांता पर पड़ी थी। उस समय 12 साल का यह खिलाड़ी ज्यादातर फुटबॉल खेलता था।
इसके बाद उन्होंने खुमान लंपक स्टेडियम स्थित SAI अकादमी में चयन प्रक्रिया में हिस्सा लिया।
वहां उनका चयन मुक्केबाजी और भारोत्तोलन, दोनों के लिए हुआ। इसके बाद तत्कालीन कोच एस. ब्रोजेंद्र सिंह ने अंतिम फैसला लिया और उन्हें भारोत्तोलन में करियर बनाने की सलाह दी।
करियर
ऐसा रहा है ऋषिकांता का करियर
भारतीय सेना का प्रतिनिधित्व करते हुए ऋषिकांता ट्रेनिंग के लिए इम्फाल से पुणे स्थित आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट गए।
इसके बाद पटियाला के नेताजी सुभाष नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (NIS) गए, जो भारतीय वेटलिफ्टिंग का पारंपरिक गढ़ माना जाता है।
उन्होंने 2019 में राष्ट्रमंडल चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता और इसके बाद 2022 में एशियन चैंपियनशिप में छठा स्थान हासिल किया था।
उन्होंने 2025 में भी राष्ट्रमंडल चैंपियनशिप में स्वर्ण जीता था।