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दुनिया की पहली व्यावसायिक ब्रेन-चिप को मंजूरी, चीन ने मस्क की न्यूरालिंक को छोड़ा पीछे
दुनिया की पहली व्यावसायिक ब्रेन-चिप को मंजूरी

दुनिया की पहली व्यावसायिक ब्रेन-चिप को मंजूरी, चीन ने मस्क की न्यूरालिंक को छोड़ा पीछे

Jun 08, 2026
12:53 pm

क्या है खबर?

ब्रेन-चिप तकनीक की वैश्विक दौड़ में चीन ने एलन मस्क की न्यूरालिंक को पीछे छोड़ दिया है। चीन ने NEO नाम के दुनिया के पहले व्यावसायिक रूप से मंजूर इनवेसिव ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) को मंजूरी दे दी है। इस चिप को न्यूराकल टेक्नोलॉजी और सिंघुआ यूनिवर्सिटी ने मिलकर विकसित किया है। इसका मकसद लकवाग्रस्त लोगों को फिर से हाथों की गतिविधियां करने में मदद देना है। इस उपलब्धि को चीन की बड़ी तकनीकी सफलता माना जा रहा है।

खासियत

क्या है NEO चिप की सबसे बड़ी खासियत?

NEO चिप का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे दिमाग के अंदर गहराई तक लगाने की जरूरत नहीं पड़ती है। न्यूरालिंक के विपरीत, यह चिप दिमाग की बाहरी सुरक्षा परत पर लगे सेंसरों के जरिए संकेतों को पढ़ती है। इससे सर्जरी से जुड़े कई जोखिम कम हो जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कम जटिल डिजाइन और बेहतर सुरक्षा के कारण इस तकनीक को नियामकीय मंजूरी भी अपेक्षाकृत काफी जल्दी मिल गई।

उम्मीद

मरीजों को मिल रही नई उम्मीद

यह चिप दिमागी संकेतों को पढ़कर उन्हें कंप्यूटर तक पहुंचाती है। इसके बाद ये संकेत रोबोटिक उपकरणों को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। एक क्लिनिकल ट्रायल में शामिल 39 वर्षीय मरीज, जो एक दुर्घटना के बाद लकवाग्रस्त हो गए थे, इस तकनीक की मदद से फिर से पेन पकड़कर अपना नाम लिखने में सफल रहे। शोधकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में यह तकनीक कई मरीजों को अधिक स्वतंत्र जीवन जीने में मदद कर सकती है।

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निवेश

ब्रेन-चिप तकनीक में बड़ा निवेश कर रहा चीन

चीन केवल एक चिप तक सीमित नहीं रहना चाहता है। देश ने ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस को अपनी रणनीतिक तकनीकों में शामिल किया है और इस क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व का लक्ष्य रखा है। सरकार और कंपनियां मिलकर नई तकनीकों पर काम कर रही हैं। NEO चिप को स्वास्थ्य बीमा प्रणाली से जोड़ने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं, जिससे भविष्य में इसका उपयोग बड़े स्तर पर किया जा सकेगा।

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अन्य

AI और ब्रेन-चिप का हो रहा मेल

चीन की कंपनियां अब ब्रेन-चिप तकनीक को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के साथ जोड़ने पर भी काम कर रही हैं। शुरुआती परीक्षणों में कुछ मरीज केवल सोच के जरिए कंप्यूटर कर्सर और घरेलू उपकरण नियंत्रित करने में सफल रहे हैं। इसके अलावा, ऐसी तकनीक विकसित की जा रही है जो दिमागी संकेतों को भाषा में बदल सके। इससे बोलने की क्षमता खो चुके लोगों को संवाद करने में मदद मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।

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