क्या है स्पेस का 'टो ट्रक'? खराब सैटेलाइट को ऐसे बचाएगा भारत का ये यान
क्या है खबर?
बेंगलुरु की डीप-टेक कंपनी ऑल स्पेस ने अंतरिक्ष में खराब हो रहे सैटेलाइट्स को बचाने की दिशा में अहम कदम उठाया है। कंपनी ने ISRO की रेंडेज़वस सिमुलेशन लेबोरेटरी में अपनी सैटेलाइट डॉकिंग तकनीक का सफल परीक्षण किया है। इस तकनीक ने टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल-6 हासिल किया है। इसका मकसद ऐसे सैटेलाइट्स की मदद करना है, जो ईंधन की कमी, तकनीकी खराबी या किसी अन्य कारण से काम करना बंद कर देते हैं और अंतरिक्ष में पड़े रहते हैं।
टो ट्रक
क्या है स्पेस का टो ट्रक?
स्पेस का टो ट्रक सर्विसिंग अंतरिक्ष यान होगा, जो खराब या नियंत्रण खो चुके सैटेलाइट तक पहुंचकर उसे संभाल सकेगा।
जिस तरह सड़क पर टो ट्रक खराब वाहन को खींचकर सुरक्षित जगह ले जाता है, उसी तरह यह यान अंतरिक्ष में सैटेलाइट की मदद करेगा।
यह सैटेलाइट को जरूरी धक्का देकर उसकी कक्षा बनाए रखने, उसे दूसरी कक्षा में ले जाने या जरूरत पड़ने पर सक्रिय कक्षा से सुरक्षित दूरी पर करने में भी काम आ सकता है।
काम
कैसे सैटेलाइट तक पहुंचेगा यह यान?
ऑल स्पेस का सर्विसिंग यान कंप्यूटर विजन और स्वचालित नेविगेशन की मदद से काम करेगा।
सबसे पहले यह अंतरिक्ष में मौजूद लक्ष्य सैटेलाइट की स्थिति, गति और घूमने की दिशा को पहचानने की कोशिश करेगा। इसके बाद यान धीरे-धीरे उसके पास पहुंचेगा और सुरक्षित दूरी बनाए रखते हुए डॉकिंग की प्रक्रिया पूरी करेगा।
यह काम कठिन होगा, क्योंकि LEO में सैटेलाइट करीब 28,000 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से लगातार घूमते रहते हैं और कई बार नियंत्रण में भी नहीं होते।
डॉकिंग
डॉकिंग के बाद क्या करेगा स्पेस टो ट्रक?
डॉकिंग के बाद सर्विसिंग यान खराब सैटेलाइट को जरूरी सहायता दे सकेगा।
वह उसकी कक्षा बनाए रखने में मदद कर सकता है या उसे ऐसी कक्षा में ले जा सकता है, जहां वह दूसरे सैटेलाइट्स के लिए खतरा न बने। यह तकनीक उन सैटेलाइट्स के लिए खासतौर पर उपयोगी हो सकती है, जो खुद दूसरे यान से जुड़ने के लिए डिजाइन नहीं किए गए हैं।
भविष्य में अंतरिक्ष उपकरणों को छोड़ने की जरूरत कम हो सकती है।
मदद
अंतरिक्ष कचरा घटाने में भी मिलेगी मदद
इस तकनीक की जरूरत इसलिए बढ़ रही है, क्योंकि अंतरिक्ष में सैटेलाइट्स की संख्या लगातार बढ़ रही है और उनके खराब होने से अंतरिक्ष कचरा भी बढ़ता जा रहा है।
ऑल स्पेस ने तकनीक के विकास और अंतरिक्ष में परीक्षण के लिए बड़ी फंडिंग जुटाई है।
अगर यह तकनीक आगे चलकर कक्षा में सफल होती है, तो सैटेलाइट की उम्र बढ़ाने, अंतरिक्ष कचरा घटाने और भारत की निजी अंतरिक्ष सेवाओं को मजबूत करने में काफी मदद मिल सकती है।