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क्या है एंथ्रोपिक का प्रोजेक्ट ग्लासविंग? AI से साइबर सुरक्षा करेगा मजबूत
एंथ्रोपिक ने लॉन्च किया प्रोजेक्ट ग्लासविंग

क्या है एंथ्रोपिक का प्रोजेक्ट ग्लासविंग? AI से साइबर सुरक्षा करेगा मजबूत

Apr 08, 2026
06:33 pm

क्या है खबर?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कंपनी एंथ्रोपिक ने प्रोजेक्ट ग्लासविंग नाम की नई साइबर सुरक्षा पहल शुरू की है। इस प्रोजेक्ट में बड़ी टेक कंपनियां और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी संस्थाएं शामिल हैं। इसका मकसद एक नए और एडवांस AI मॉडल की टेस्टिंग करना है, जो अभी आम लोगों के लिए उपलब्ध नहीं है। यह पहल तेजी से बढ़ते साइबर खतरों को देखते हुए शुरू की गई है, ताकि सिस्टम को पहले से ज्यादा सुरक्षित बनाया जा सके।

ग्लासविंग

क्या है प्रोजेक्ट ग्लासविंग?

प्रोजेक्ट ग्लासविंग एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जहां एडवांस AI की मदद से सॉफ्टवेयर की कमियों को खोजा जाता है। इसमें "क्लाउड मिथोस प्रीव्यू" नाम का खास AI मॉडल इस्तेमाल हो रहा है, जो कोडिंग और तर्क करने में मजबूत है। यह ऑपरेटिंग सिस्टम, ब्राउजर और बड़े सॉफ्टवेयर में छिपी कमजोरियों को पहचान सकता है। खास बात यह है कि यह मॉडल आम लोगों के लिए नहीं है, बल्कि सिर्फ चुनिंदा कंपनियों को ही दिया गया है।

उद्देश्य

सुरक्षा मजबूत करने का है मुख्य उद्देश्य

इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य साइबर सुरक्षा को पहले से ज्यादा मजबूत बनाना है। AI की मदद से यह सिस्टम उन खतरों को भी पकड़ सकता है, जो लंबे समय से छिपे हुए थे। इससे कंपनियों को समय रहते समस्याओं को ठीक करने का मौका मिलता है। माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों का मानना है कि AI के जरिए बड़े स्तर पर सुरक्षा को बेहतर बनाया जा सकता है और जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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काम

बड़ी कंपनियां मिलकर कर रही हैं काम

साइबर सुरक्षा से जुडी इस बड़ी पहल में अमेजन वेब सर्विसेज (AWS) और गूगल जैसी कंपनियां भी शामिल हैं। ये सभी कंपनियां अपने सिस्टम में इस AI मॉडल की टेस्टिंग कर रही हैं, ताकि कोड और नेटवर्क को और सुरक्षित बनाया जा सके। कंपनियों का कहना है कि साइबर खतरों से निपटने के लिए अब मिलकर काम करना जरूरी हो गया है और AI इसमें बड़ी भूमिका निभा सकता है।

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सुरक्षा

ओपन सोर्स और भविष्य की सुरक्षा पर फोकस

प्रोजेक्ट ग्लासविंग का फोकस ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर की सुरक्षा पर भी है, जो आज डिजिटल सिस्टम की नींव है। एंथ्रोपिक ने इस काम के लिए 10 करोड़ डॉलर (लगभग 920 करोड़ रुपये) तक के उपयोग क्रेडिट और 4 लाख डॉलर (लगभग 37 करोड़ रुपये) की फंडिंग देने की योजना बनाई है। इसका मकसद ज्यादा संगठनों को जोड़ना और कमजोरियों को पहले ही ठीक करना है, ताकि भविष्य में साइबर हमलों के खतरे को कम किया जा सके।

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