अध्ययन में पेड़ों की जलवायु संकट से लड़ने की क्षमता पर उठे सवाल
जलवायु परिवर्तन से लड़ने में पेड़ कितने कारगर हैं, इस पर एक नए अध्ययन में सवाल खड़े किए गए हैं। इससे पता चला है कि पेड़ भले ही लंबे समय तक प्रकाश संश्लेषण करते रहें, लेकिन वे इसके बंद होने से कई महीनों पहले ही बढ़ना बंद कर देते हैं।
इसका मतलब है कि जितना कार्बन जमा होना चाहिए, उससे कम ही लंबे समय तक पेड़ों में रह पाता है। यह खोज इस बात पर सवाल उठाती है कि जंगल जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने में पेड़ कितनी मदद कर पाएंगे, जैसा अब तक माना जाता था।
जलवायु परिवर्तन से निपटने में जंगल एक जरूरी सुरक्षा कवच हैं, लेकिन उनकी यह क्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि वे कितनी कार्बन डाइऑक्साइड को लकड़ी में बदल सकते हैं। लकड़ी में बदलने से यह गैस, जो धरती को गर्म करती है, दशकों और सदियों तक वायुमंडल से बाहर रहती है।
वृद्धि रुकने पर मौसम का प्रभाव
वैज्ञानिकों ने पाया कि जब मौसम गर्म और सूखा होता है तो पेड़ों का बढ़ना लगभग तुरंत रुक जाता है, भले ही प्रकाश संश्लेषण थोड़ी धीमी गति से होता रहे।
मुख्य लेखक मुकुंद पलत राव ने बताया, "जैसे ही सूखे और गर्मी की स्थिति बनती है, वृद्धि की गतिविधि तुरंत रुक जाती है, जबकि प्रकाश संश्लेषण थोड़ा कम दर पर चलता रहता है।"
एक अहम बात यह है कि दशकों और सदियों तक सिर्फ वही कार्बन जमा रह पाता है, जो लकड़ी में होता है। ऐसे में अगर, जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा और लू बढ़ती रही तो जंगल भविष्य में शायद उतना कार्बन जमा न पाएं, जितना मौजूदा मॉडल अनुमान लगाते हैं।