नासा ने चांद पर बसने की योजना का किया खुलासा, क्यों दक्षिणी ध्रुव पर बनेगा ठिकाना?
क्या है खबर?
अंतरिक्ष एजेंसी नासा अब चांद पर इंसानों के रहने के लिए बेस बनाने की तैयारी तेज कर रही है। एजेंसी की योजना अगले 10 साल में चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास यह बेस तैयार करने की है। इस इलाके को इसलिए चुना गया है, क्योंकि यहां बड़ी मात्रा में पानी की बर्फ होने की उम्मीद है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह बर्फ अरबों सालों से वहां मौजूद है। इसे मिशन के लिए बेहद अहम माना जा है।
वजह
दक्षिणी ध्रुव पर क्यों बनेगा बेस?
नासा के मुताबिक, चांद का दक्षिणी ध्रुव कई वजहों से खास है। यहां कुछ ऊंची जगहों पर लंबे समय तक धूप मिलती है, जिससे बिजली बनाने में मदद मिल सकती है। वहीं कई क्रेटर ऐसे हैं जहां हमेशा छाया रहती है और वहां बर्फ जमा होने की संभावना है। एजेंसी का कहना है कि एक ही जगह पर रहने, रिसर्च और तकनीक की सारी जरूरतें पूरी नहीं होंगी। इसलिए बेस कई हिस्सों में थोड़ा फैला हुआ बनाया जाएगा।
ड्रोन
2028 में भेजे जाएंगे खास ड्रोन
नासा योजना के तहत 2028 में छोटे खास ड्रोन चांद पर भेजेगी। ये ड्रोन पहले दक्षिणी ध्रुव की जमीन की जांच करेंगे और बेस के लिए सही जगह तय करने में मदद करेंगे। इस मिशन के लिए फायर फ्लाई एयरोस्पेस को 7.5 करोड़ डॉलर (लगभग 7 अरब रुपये) का कॉन्ट्रैक्ट दिया गया है। नासा का कहना है कि ये ड्रोन वैज्ञानिक मकसद के साथ बेस की सीमाएं तय करने में भी काम आएंगे, जिससे आगे की तैयारी आसान हो सकेगी।
तकनीक
रोवर और दूसरी तकनीक पर भी जोर
नासा ने चांद की सतह पर चलने वाले खास रोवर बनाने के लिए भी बड़े कॉन्ट्रैक्ट दिए हैं। एस्ट्रोलैब को 21.9 करोड़ डॉलर (लगभग 2,100 करोड़ रुपये) और लूनर आउटपोस्ट को 22 करोड़ डॉलर दिए गए हैं। ये रोवर इंसानों के पहुंचने से पहले चांद पर उतर सकते हैं। इन्हें धरती से कंट्रोल किया जा सकेगा। नासा चाहती है कि 2028 के आखिर तक कम से कम एक रोवर वहां पहुंच जाए।
मिशन
तीन चरणों में पूरा होगा मिशन
नासा पूरे मिशन को तीन हिस्सों में पूरा करेगी। पहला चरण 2029 तक चलेगा, जिसमें जरूरी जानकारी जुटाई जाएगी। दूसरा चरण 2029 से 2032 तक रहेगा और इसमें बेस की शुरुआती तैयारी होगी। तीसरे चरण में 2032 के बाद चांद पर लंबे समय तक इंसानों की मौजूदगी का लक्ष्य रखा गया है। नासा का कहना है कि यह इंसानियत का किसी दूसरी दुनिया पर पहला स्थायी ठिकाना बन सकता है। यह अंतरिक्ष इतिहास में बड़ा कदम माना जा रहा है।