भारत की नई अंतरिक्ष नीति से ISRO के भविष्य पर क्या पड़ेगा असर?
भारत की नई अंतरिक्ष नीति के तहत अब निजी कंपनियों को रॉकेट बनाने और रोजमर्रा के अंतरिक्ष मिशनों को पूरा करने में बड़ी भूमिका मिलेगी। इस कदम से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) को अपने बड़े और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स पर ज्यादा ध्यान देने का मौका मिल गया है।
हालांकि, इस नीति में किए गए बदलाव का मुख्य मकसद अंतरिक्ष क्षेत्र में नए-नए नवाचारों को बढ़ावा देना और भारत को इस दौड़ में सबसे आगे रखना है।
दूसरी तरफ, ISRO के कुछ कर्मचारियों को यह चिंता सता रही है कि कहीं उनका संगठन केवल एक रिसर्च और डेवलपमेंट यूनिट बनकर न रह जाए, जिसकी भूमिका सीमित हो जाए।
हालांकि, जानकारों का कहना है कि देश के बड़े और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मिशनों में एजेंसी की भूमिका हमेशा की तरह केंद्रीय और अहम बनी रहेगी।
स्टार्टअप्स ने जुटाए 80 करोड़ डॉलर
इस नीति के बाद से लगभग 400 स्टार्टअप्स ने मिलकर करीब 80 करोड़ डॉलर (करीब 7,600 करोड़ रुपये) का फंड जुटाया है। साथ ही लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स जैसी बड़ी कंपनियों को भी अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़े कई बड़े अनुबंध मिलने शुरू हो गए हैं।
यह कदम दुनियाभर में चल रहे रुझानों के बिल्कुल अनुरूप है। इसमें कम लागत में काम पूरा करने और तेज गति से आगे बढ़ने के लिए नासा का स्पेस-X जैसी निजी कंपनियों के साथ मिलकर काम करना भी शामिल है।
सरकार का कहना है कि इस नीति का लक्ष्य भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र को अधिक प्रभावी और अभिनव बनाना है। इसके साथ ही ISRO को रिसर्च और नई-नई खोजों के लिए एक मजबूत आधार बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।