AI के बढ़ते खर्चे पर लगाम लगाने के लिए कंपनियां अपना रहीं नए रास्ते
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टोकन के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में कंपनियां अब इस तकनीक पर अपना खर्च बहुत सोच-समझकर कर रही हैं।
डेलॉयट दक्षिण एशिया के प्रमुख रणनीति और नवाचार अधिकारी अश्विन वेल्लोडी का कहना है कि अब कंपनियां हर वर्कफ्लो और हर कस्टमर क्वेरी की लागत पर खास नजर रखती हैं।
ऐसा इसलिए, ताकि उनके निवेश का उन्हें पूरा मूल्य मिल सके। बजट को नियंत्रण में रखने के लिए कंपनियां डैशबोर्ड का इस्तेमाल करती हैं, उपयोग की सीमाएं तय करती हैं और महंगे मॉडल्स के इस्तेमाल के लिए पहले से मंजूरी लेना जरूरी कर देती हैं।
कंपनियां स्थानीय मॉडल्स चुन रहीं
पैसा बचाने के लिए HCL टेक जैसी कंपनियां महंगे बाहरी सिस्टम्स की बजाय अपने स्थानीय AI मॉडल्स और GPUs का इस्तेमाल कर रही हैं। यह कहना है कंपनी के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी (CTO) विजय गुंटूर का।
टेक महिंद्रा के मुख्य नवाचार अधिकारी निखिल मल्होत्रा के अनुसार, कंपनी छोटे ओपन-सोर्स मॉडल्स का उपयोग कर रही है और अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने खुद के AI मॉडल्स तैयार कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि 2030 तक दुनियाभर में AI टोकन का इस्तेमाल बहुत तेजी से बढ़ेगा। ऐसे में नियमित रूप से खर्चों की जांच करते रहने से लागत पर नियंत्रण बना रहता है।