शहरी क्षेत्र के 50 फीसदी बच्चे ऑनलाइन उत्पीड़न का शिकार, सर्वे में किया खुलासा
क्या है खबर?
देश में 9-17 वर्ष के बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर किए सर्वे के परिणामों ने सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। लोकलसर्कल्स के सर्वेक्षण में 50 फीसदी अभिभावकों ने स्वीकार किया कि उनके बच्चे ऑनलाइन उत्पीड़न का शिकार हुए हैं या गलत कंटेंट के जाल में फंस गए हैं। लगभग आधे बच्चे प्रतिदिन 3 या उससे अधिक घंटे ऑनलाइन बिताते हैं। इससे क्रोध, नींद की कमी, पढ़ाई में ध्यान भटकना और चिंता जैसी समस्याएं बढ़ गई हैं।
डीपफेक
46 फीसदी बच्चे देखते हैं डीपफेक कंटेंट
लोकलसर्कल्स ने पिछले साल दिसंबर में 302 जिलों के 89,000 से अधिक शहरी अभिभावकों के बीच यह सर्वेक्षण किया है, जिनमें से 61 फीसदी पुरुष और 39 फीसदी महिलाएं थीं। सर्वे में पाया है कि लगभग आधे (46 प्रतिशत) बच्चे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित फोटो/वीडियो मॉर्फिंग या डीपफेक कंटेंट देखते हैं। इसके अलावा 39 प्रतिशत ने अजनबियों द्वारा उत्पीड़न या दुर्व्यवहार का उल्लेख किया। 60 प्रतिशत से अधिक माता-पिता ने अपने बच्चों में बढ़ती आक्रामकता या चिड़चिड़ापन देखा है।
सोशल मीडिया
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का भी है खतरा
सर्वेक्षण के अनुसार, 75 प्रतिशत अभिभावक मानते हैं कि इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, डिस्कोर्ड और बीरियल जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उत्पीड़न का सबसे बड़ा खतरा पैदा करते हैं। गेमिंग प्लेटफॉर्म भी इसके करीब हैं, जहां 52 प्रतिशत लोगों ने इन-गेम चैट को दुर्व्यवहार का अड्डा बताया। व्हाट्सऐप और टेलीग्राम जैसे मैसेजिंग ऐप्स को भी 42 प्रतिशत ने खतरे का कारण बताया। अभिभावकों का कहना है कि समस्या केवल कंटेंट के दिखने की नहीं है, बल्कि शिकायत निवारण के साधनों की कमी है।