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महिला आरक्षण-परिसीमन से जुड़े विधेयकों को संसद से पारित करा पाएगी सरकार? 
संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयक पेश किए गए

महिला आरक्षण-परिसीमन से जुड़े विधेयकों को संसद से पारित करा पाएगी सरकार? 

लेखन आबिद खान
Apr 16, 2026
12:26 pm

क्या है खबर?

संसद का विशेष सत्र आज से शुरू हो गया है। इस दौरान महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े 3 विधेयक पेश किए गए। इन विधेयकों में महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण और लोकसभा सीटों की संख्या मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। विपक्ष इन विधेयकों का विरोध कर रहा है। ऐसे में समझते हैं कि क्या सरकार विधेयकों को पारित करा पाएगी।

लोकसभा

क्या है लोकसभा की स्थिति?

दरअसल, इन विधेयकों के जरिए संविधान में संशोधन किए जाने का प्रस्ताव है, इसलिए इन्हें विशेष बहुमत से पारित किया जाना जरूरी है। इसके लिए सरकार को सदन के कुल सदस्यों का बहुमत (यानी 50 प्रतिशत से ज्यादा) और सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत हासिल करना होगा। फिलहाल लोकसभा में 540 सदस्य हैं। अगर सभी सांसद मतदान करते हैं, तो कम से कम 360 सांसदों (दो तिहाई‌) को पक्ष में वोट करना होगा।

पारित

क्या लोकसभा से पारित हो पाएंगे विधेयक?

फिलहाल भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के पास लोकसभा में 292 सांसद हैं। इनमें भाजपा के 240, TDP के 16, JDU के 12, शिवसेना शिंदे के 7, लोजपा (रामविलास) के 5, जनसेना, JDS और RLD के 2-2 सांसद हैं। वहीं, विपक्षी गठबंधन INDIA के पास 233 सांसद हैं। 15 सांसद किसी गठबंधन के साथ नहीं हैं। यानी विधेयकों को पारित कराने के लिए NDA को 68 और सांसदों की जरूरत होगी।

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राज्यसभा

राज्यसभा की स्थिति कैसी है?

फिलहाल राज्यसभा में बहुमत का आंकड़ा 163 है। NDA के पास 142 के आसपास सदस्य हैं। यानी उसे 21 और सांसदों की जरूरत है। हालांकि, कई विपक्षी पार्टियों ने सैद्धांतिक रूप से महिलाओं के लिए आरक्षण का समर्थन किया है, लेकिन उन्होंने इसे परिसीमन से जोड़ने पर आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि इससे राज्यों में प्रतिनिधित्व बदल सकता है। यानी दोनों ही सदनों में स्थिति सरकार के पक्ष में नहीं है।

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प्लस

न्यूजबाइट्स प्लस

महिला आरक्षण विधेयक को पहली बार 12 सितंबर, 1996 को तत्कालीन देवेगौड़ा सरकार ने संसद में पेश किया था। हालांकि, सरकार भंग होने के कारण ये पारित नहीं हो सका। इसके बाद 1997, 1998, 1999 और 2003 में इसे 4 बार पेश किया गया, लेकिन एक बार भी पारित नहीं हो पाया। UPA सरकार ने 2008 में इसे पेश किया और काफी मशक्कत के बाद 2010 में ये राज्यसभा से पारित हो गया, लेकिन लोकसभा में पेश नहीं हो सका।

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