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12 या 13 अक्टूबर, कब है दशहरा? जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त और अन्य जरूरी बातें

12 या 13 अक्टूबर, कब है दशहरा? जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त और अन्य जरूरी बातें

लेखन अंजली
Oct 10, 2024
04:38 pm

क्या है खबर?

दशहरा 9 दिवसीय शारदीय नवरात्रि के अंत और दिवाली के आगमन का प्रतीक है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाता है। इस त्योहार पर देशभर में रावण दहन का भव्य उत्सव मनाया जाता है, लेकिन इस साल दशहरे की सही तारीख को लेकर कुछ असमंजस की स्थिति है क्योंकि इस साल दशमी तिथि दो दिन (12 और 13 अक्टूबर) तक रहेगी। आइए इस त्योहार की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और अन्य महत्वपूर्ण बातें जानते हैं।

तिथि और शुभ मुहूर्त

दशहरे की सही तिथि और शुभ मुहूर्त 

द्रिक पंचांग के अनुसार, दशहरा 12 अक्टूबर (शनिवार) को मनाया जाएगा और दशहरा तिथि को अबूझ मुहूर्त माना जाता है, जिसमें बिना किसी मुहूर्त के शुभ कार्य किए जा सकते हैं। फिर भी दशहरे की पूजा के लिए मुख्य रूप से 3 मुहूर्त सबसे शुभ हैं: विजय मुहूर्त: दोपहर 02:03 से लेकर 02:49 बजे तक राहु काल: सुबह 09:14 से लेकर सुबह 10:40 बजे तक अपराह्न पूजा का समय: दोपहर 01:17 से लेकर 03:35 बजे तक का है।

कारण

दशहरा क्यों मनाया जाता है? 

हिंदू पौराणिक कथाओं के मुताबिक, रावण लंका का एक राजा था, जिसने भगवान राम की पत्नी सीता का अपहरण किया और उन्हें अपने राज्य लंका ले गया। वहां उसने सीता को बंधक बना लिया। इसके बाद भगवान राम ने अपनी वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई और युद्ध के 10वें दिन रावण का वध किया। तब से देशभर में इस दिन को दशहरे के रूप में मनाया जाता है।

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महत्व

बुराई पर अच्छाई के महत्व को प्रकट करता है यह त्योहार 

यह त्योहार इस बात अनुस्मारक है कि अच्छाई की हमेशा बुराई पर जीत होती है, फिर चाहें स्थिति कैसी भी हो। दशहरा अच्छाई की जीत का जश्न मनाने और बुराई के सभी रूपों से लड़ने की हमारी प्रतिबद्धता को नवीनीकृत करने का समय है। इसी दिन मां दुर्गा ने 9 दिन की लड़ाई के बाद महिषासुर का वध भी किया था। इस वजह से यह दिन बुराई पर अच्छाई का महत्व समझाता है।

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तरीका

दशहरे का त्योहार कैसे मनाया जाता है?

उत्तर भारत में दशहरे के त्योहार के 9 दिन पहले रामलीला का आयोजन किया जाता है, जिसमें नाटकीय रूप में भगवान राम की कहानी को दर्शाया जाता है और इसका समापन 10वें दिन यानी दशहरे पर नाटकीय रूप में रावण के वध से होता है। इस मौके पर रावण के आदमकद पुतले को मेघनाद और कुम्भकर्ण के पुतलों के साथ जलाया जाता है। इस अवसर पर जलेबी खाना शुभ माना जाता है।

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