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पाकिस्तानी सीमा के पास भारतीय सेना कमान पहुंचे अमेरिकी राजदूत, जानिए इसके पीछे का कारण
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और इंडो-पैसिफिक कमांड के अमेरिकी कमांडर सैमुअल जे पपारो ने किया भारतीय सेना की पश्चिमी कमान का दौरा

पाकिस्तानी सीमा के पास भारतीय सेना कमान पहुंचे अमेरिकी राजदूत, जानिए इसके पीछे का कारण

Feb 17, 2026
06:54 pm

क्या है खबर?

भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और इंडो-पैसिफिक कमांड के अमेरिकी कमांडर सैमुअल जे पपारो ने मंगलवार (16 फरवरी) को चंडीगढ़ के पास चंडीमंदिर में भारतीय सेना की पश्चिमी कमान के मुख्यालय का दौरा किया। इसने एशियाई देशों का ध्यान खींचा है। इस दौरे को भारत और अमेरिका के बीच विकसित हो रहे सैन्य संबंधों में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में आइए जानते हैं अमेरिकी राजदूत ने यह दौरा आखिर क्यों किया है।

जानकारी

पाकिस्तानी सीमा से 250 किलोमीटर दूर है यह कमान

भारतीय सेना की अग्रिम पंक्ति की यह पश्चिमी कमान पाकिस्तान सीमा से 250 किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित है। बता दें कि भारत और अमेरिका थल, समुद्री, हवाई, साइबर और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में रक्षा सहयोग का विस्तार करने में जुटे हैं।

मुलाकात

अमेरिकी राजदूत के दौरे में क्या था खास?

पश्चिमी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार के साथ मुलाकात में प्रतिनिधिमंडल को कमान की परिचालन जिम्मेदारियों, तत्परता की स्थिति, ऐतिहासिक विकास और प्रमुख सैन्य अभियानों में इसकी भूमिका की जानकारी दी गई। चर्चा का मुख्य केंद्र भारत के पश्चिमी मोर्चे पर रणनीतिक सुरक्षा चुनौतियों पर था, जो कि पाकिस्तान के साथ लंबे समय से चले आ रहे सैन्य गतिरोध और संघर्ष के इतिहास के कारण संवेदनशील क्षेत्र है।

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सूचना

अमेरिकी राजदूत को क्या-क्या जानकारियां दी गईं?

पश्चिमी कमान के अनुसार, अमेरिकी राजदूत को पश्चिमी सीमा पर हर स्थिति से निपटने के लिए कमान की तैयारी, परिचालन संबंधी तैयारियों, भारतीय सेना की युद्ध व्यवस्था में कमान की विरासत, 'ऑपरेशन सिंदूर' के संचालन और घरेलू विकास और क्षेत्रीय स्थिरता में योगदान देने में सेना की भूमिका की विस्तृत जानकारी दी गई। इसके बाद गौर ने इस दौरे की एक्स पर जानकारी देते हुए शानदार स्वागत और सूचनाएं मुहैया कराने के लिए कटियार का धन्यवाद भी किया।

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महत्व

रणनीतिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है पश्चिमी कमान?

भारत-पाकिस्तान सीमा पर भौगोलिक और रणनीतिक जिम्मेदारियों के कारण पश्चिमी कमान भारतीय सेना की सबसे महत्वपूर्ण परिचालन इकाइयों में से एक है। चंडीगढ़ के पास चंडीमंदिर में मुख्यालय वाली यह कमान पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल और जम्मू के कुछ हिस्सों सहित एक विशाल और घनी आबादी वाले क्षेत्र की देखरेख करती है। इसका क्षेत्र जम्मू-कश्मीर के अखनूर से पंजाब के फाजिल्का तक फैला है। जिसमें पाकिस्तान के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा का अधिकांश भाग शामिल है।

ताकत

क्या है पश्चिमी कमान की ताकत?

पारंपरिक युद्ध में पारंगत पश्चिमी कमान की आक्रामक क्षमता एक स्ट्राइक कोर में निहित है जिसे शत्रुता की स्थिति में गहरी घुसपैठ के अभियानों का कार्य सौंपा गया है। इसकी होल्डिंग कोर सीमा के साथ मजबूत रक्षात्मक रेखाओं को बनाए रखने और भीतरी इलाकों में प्रमुख जनसंख्या केंद्रों और बुनियादी ढांचे की रक्षा करने के लिए जिम्मेदार हैं। यह कमान युद्धाभ्यास बलों के समर्थन में भारी गोलाबारी करने के लिए डिजाइन विशाल तोपखाने के गठन को भी नियंत्रित करती है।

भूमिका

'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान पश्चिमी कमान की भूमिका

भारत की ओर से पाकिस्तान के खिलाफ चलाए गए 'ऑपरेशन सिंदूर' में पश्चिमी कमान ने केंद्रीय भूमिका निभाई थी। उस दौरान कमान ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पर रक्षात्मक स्थिरता बनाए रखते हुए सुनियोजित सैन्य प्रभाव प्रदान करने के लिए जमीनी बलों, तोपखाने संपत्तियों और सहायक तत्वों की तैनाती का समन्वय किया था। उस दौरान कमान के प्रदर्शन ने अनियंत्रित तनाव को भड़काए बिना सटीक और समयबद्ध अभियानों को अंजाम देने की उसकी मजबूत क्षमता को उजागर किया था।

ध्यान

अमेरिकी राजदूत की यात्रा क्यों आकर्षित किया ध्यान?

सरकार ने इस यात्रा को दोनों देशों के बीच चल रहे रक्षा सहयोग के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया है। हालांकि, पाकिस्तान सीमा के निकट स्थित एक सक्रिय सैन्य कमान में विदेशी राजदूत की उपस्थिति को विपक्ष ने असामान्य घटनाक्रम के रूप में चित्रित किया है। कई विपक्षी नेताओं ने इस दौरे के बाद देश की संप्रभुता और संवेदनशील सैन्य प्रतिष्ठानों तक विदेशी पहुंच से होने वाले संभावित नुकसान और सुरक्षा खतरे को लेकर चिंता जताई है।

सवाल

भारत-अमेरिका रक्षा ढांचे में किस प्रकार शामिल है यह दौरा?

फरवरी की शुरुआत में भारत और अमेरिका ने दिल्ली में रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRU) के मुख्यालय में 24वें संयुक्त तकनीकी समूह की पूर्ण बैठक आयोजित की थी। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य रक्षा विज्ञान और प्रौद्योगिकी में सहयोग को आगे बढ़ाना था। यह तकनीकी सहयोग अक्टूबर 2025 में कुआलालंपुर में आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अमेरिकी युद्ध सचिव पीट हेगसेथ द्वारा हस्ताक्षरित 10 वर्षीय रक्षा ढांचा समझौते के अनुरूप है।

समझौता

समझौते में क्या-क्या शामिल है?

इस समझौते में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सैन्य सहयोग, संयुक्त परियोजनाओं और क्षमता निर्माण के लिए दीर्घकालिक उद्देश्यों की रूपरेखा दी गई है। यही कारण रहा कि नवंबर में भारतीय नौसेना प्रमुख दिनेश के त्रिपाठी ने नौसेना सहयोग को मजबूत करने के उद्देश्य से अमेरिका की आधिकारिक यात्रा की थी। उस यात्रा के दौरान उन्होंने अमेरिकी नौसेना सचिव और इंडोपाकॉम के नेतृत्व सहित वरिष्ठ अमेरिकी नागरिक और सैन्य नेताओं से मुलाकात करते हुए अहम जानकारियां जुटाई थी।

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