सुप्रीम कोर्ट ने CBSE को दिखाया आईना, 9वीं में 'तीसरी भाषा' पर नया मोड़
सुप्रीम कोर्ट ने CBSE के उस फैसले पर सवाल उठाए हैं, जिसमें उसने 9वीं कक्षा के लिए तीसरी भाषा को अचानक अनिवार्य कर दिया है। जस्टिस बी वी नागरथना ने इसे "बचा जा सकने वाला अकादमिक दबाव" बताया और सुझाव दिया कि इसे छठी क्लास से शुरू करना ज्यादा उचित रहेगा। यह मामला तब सामने आया जब कोर्ट तमिलनाडु की भाषा नीतियों पर जताई जा रही चिंताओं को सुन रही थी।
CBSE ने 9वीं के भाषा नियम में ढील दी
CBSE के मई में आए आदेश का माता-पिता और स्कूलों ने कड़ा विरोध किया। उनका मानना था कि अचानक किया गया यह बदलाव बहुत जल्दबाजी में उठाया गया कदम है। इस विरोध के बाद, CBSE ने मौजूदा 9वीं क्लास के छात्रों को कुछ राहत दी है। अब वे अपनी पुरानी भाषाएं चुनना जारी रख सकते हैं।
इस साल उन्हें एक तीसरी भाषा (जो कि एक भारतीय भाषा होगी) लेनी होगी, लेकिन इसका मूल्यांकन केवल स्कूल के स्तर पर होगा। सबसे अहम बात यह है कि इसका असर उनकी दसवीं क्लास की बोर्ड परीक्षाओं के नतीजों पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा।
जस्टिस नागरथना ने हिंदी थोपने की बात को नकारा
जस्टिस नागरथना ने यह भी स्पष्ट किया कि इस नीति का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि सभी को हिंदी सीखना अनिवार्य होगा। उन्होंने एक सवाल के साथ अपनी बात रखी, "आपको हिंदी नहीं चाहिए, लेकिन अगर संस्कृत है तो क्या दिक्कत है?"