सरकार का ऐतिहासिक फैसला, पश्चिमी घाट के 56,000 वर्ग किमी में खनन-निर्माण पर लगेगी रोक
केंद्र सरकार एक दशक से ज्यादा लंबी बहस और कई बदलावों के बाद अब पश्चिमी घाट में पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESA) को चिह्नित करने की अपनी योजना को अंतिम रूप दे रही है। छह राज्यों में 56,000 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा जमीन को ESA के रूप में सीमांकित करने का प्रस्ताव है। इसका मतलब यह है कि इन इलाकों में नए खनन, पत्थर निकालने के काम और बड़ी निर्माण परियोजनाओं पर या तो पूरी तरह रोक लग जाएगी या उन पर कड़ी पाबंदियां लगाई जाएंगी। ये सभी कदम 2013 की कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की सिफारिशों पर आधारित हैं।
पश्चिमी घाट ESA को लेकर राज्यों में मतभेद
एक बार जब इन सीमाओं को आधिकारिक तौर पर अधिसूचित कर दिया जाएगा, तो इन्हें पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत कानूनी मान्यता मिल जाएगी। गुजरात, गोवा और महाराष्ट्र तो इस पर सहमत दिख रहे हैं, लेकिन केरलम अपने हिस्से के प्रस्तावित क्षेत्र को और कम करवाने की मांग कर रहा है और कर्नाटक अभी तक पूरी तरह तैयार नहीं है। पश्चिमी घाट केवल सुंदरता के लिए ही नहीं जाने जाते है। ये UNESCO द्वारा मान्यता प्राप्त जैव विविधता वाले हॉटस्पॉट हैं और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जैव विविधता केंद्रों में से एक भी हैं।