सुप्रीम कोर्ट ने मातृत्व अवकाश पर कहा- बच्चे गोद लेने वाली महिलाओं को भी मिले छुट्टी
क्या है खबर?
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मातृत्व अवकाश को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। उसने सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की उस धारा को निरस्त कर दिया, जो बच्चे गोद लेने वाली महिलाओं को मातृत्व अवकाश से वंचित करता है। न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने माना कि यह भेदभाव दत्तक माताओं और 3 महीने से अधिक उम्र के दत्तक बच्चों के खिलाफ काम करता है। यह संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
फैसला
क्या है विवाद?
हम्सानंदिनी नंदूरी ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा 5(4) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। वर्ष 2017 के संशोधन से लागू इस प्रावधान के तहत, दत्तक माताओं (बच्चे गोद लेने वाली माताएं) को केवल तभी 12 सप्ताह का मातृत्व लाभ मिलता है, जब गोद लिया बच्चा 3 महीने से कम आयु का हो। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि आयु-आधारित यह प्रतिबंध मनमाना है और संविधान का उल्लंघन करता है।
फैसला
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने सुनवाई में कहा, "यह भेद 2020 संहिता के उद्देश्य से मेल नहीं खाता। मातृत्व लाभ का उद्देश्य मातृत्व से संबंधित है। 3 महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं की भूमिका और जिम्मेदारियां समान स्थिति में होती हैं। यह वर्गीकरण भावनात्मक समायोजनों की अनदेखी करता है। गोद लेना प्रजनन और निर्णय लेने की स्वायत्तता के अधिकार का प्रयोग है। गोद लिए बच्चे की जरूरतें मां से जन्मे बच्चे की जरूरतों से भिन्न नहीं होती।"
याचिका
याचिका में क्या तर्क दिया गया?
बार एंड बेंच के मुताबिक, याचिका में तर्क था कि यह प्रावधान केवल उम्र के आधार पर दत्तक बच्चों के बीच एक कृत्रिम बंटवारा करता है। साथ ही, किशोर न्याय अधिनियम और दत्तक ग्रहण विनियमों के तहत भारत के दत्तक ग्रहण ढांचे की वास्तविकताओं को भी ध्यान में नहीं रखता। इसमें यह भी कहा गया कि यह प्रतिबंध दत्तक माताओं के अधिकारों और दत्तक ग्रहण किए गए बच्चों के कल्याण और एकीकरण की आवश्यकताओं दोनों को कमजोर करता है।
फैसला
कोर्ट ने कहा- बच्चे की जरूरतें अलग नहीं होती
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने माना कि गोद लिए गए बच्चे की जरूरतें मां से जन्मे बच्चे की जरूरतों से अलग नहीं होती हैं। कोर्ट ने कहा, "पारंपरिक रूप से रिश्तेदारी परिभाषित करने के लिए जीव विज्ञान प्रमुख आधार रहा है, फिर भी गोद लेना भी मान्य मार्ग है। परिवार का निर्धारण जीव विज्ञान से नहीं, बल्कि साझा अर्थ से होता है। केवल जैविक कारक परिवार को निर्धारित नहीं करते। गोद लिया हुआ बच्चा प्राकृतिक बच्चे से भिन्न नहीं होता।"
विचार
पहले दिसंबर 2025 में सुनाया जाना था फैसला
मामले में प्रारंभिक तौर पर 12 दिसंबर, 2025 को फैसला आना था, लेकिन कोर्ट को पता चला कि सामाजिक सुरक्षा संहिता(2020) नवंबर, 2025 की अधिसूचना से आंशिक लागू हो गया है। यह संहिता सामाजिक सुरक्षा कानूनों को समेकित कर मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 समेत कई कानूनों को निरस्त करती है। तब कोर्ट ने कहा कि 2020 संहिता की धारा 60(4) 1961 अधिनियम की धारा 5(4) के समान विषय-मुद्दे पर है, जिससे प्रभावी रूप से समान कानूनी स्थिति बनी रहती है।