सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को बड़ी राहत दी, SIR को कानूनी रूप से वैध बताया
क्या है खबर?
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को चुनाव आयोग की ओर से किए जा रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को कानूनी रूप से वैध बताते हुए बड़ी राहत दी है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने यह फैसला SIR अभ्यास की वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनाया है। पिछले साल जून में बिहार में SIR को आयोजित करने पर इसकी वैधता पर सवाल उठाए गए थे।
फैसला
संविधान में नई जान डालता है SIR- कोर्ट
कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि आयोग को संविधान के अनुच्छेद-324 के तहत, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और उसके तहत बनाए गए नियमों के अनुसार, SIR आयोजित करने का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि चुनावी SIR स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संवैधानिक अनिवार्यता को आगे बढ़ाता है और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में एक नई जान फूंकता है। कोर्ट ने कहा कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को ज्यादा शुद्ध और विश्वसनीय बनाना है।
फैसला
CJI ने क्या फैसला सुनाया?
CJI सूर्यकांत ने कहा, "जब स्वयं क़ानून में चुनाव आयोग द्वारा उचित समझे जाने वाले तरीके से SIR का अधिकार दिया गया है, तो विवादित प्रक्रिया को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता। हमारी राय में, SIR लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम और नियमों का स्थान नहीं लेता है। बल्कि, यह अनुच्छेद-324 के तहत संवैधानिक जनादेश को धारा 21(3) द्वारा निर्धारित वैधानिक सीमाओं के भीतर सक्रिय करता है। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि आयोग ने वैधानिक शक्तियों का उल्लंघन किया है।"
फैसला
मतदाता सूची में अशुद्धियों की संभावना थी- कोर्ट
कोर्ट ने कहा, "SIR स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संवैधानिक अनिवार्यता को आगे बढ़ाता है...यह केवल मतदान की प्रक्रिया पर निर्भर नहीं करते। वे मतदाता सूचियों की सत्यनिष्ठा, सटीकता और विश्वसनीयता पर निर्भर करते हैं, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव हैं।" आयोग ने SIR के लिए कई कारण बताए, जिससे कोर्ट संतुष्ट है। आयोग ने बताया कि अंतिम SIR 4 दशक पहले हुआ, बड़े पैमाने पर जोड़-घटाव हुए, तीव्र शहरीकरण, प्रवासन और पुनरावृत्ति-अशुद्धियों की वजह से SIR होना आवश्यक है।
नागरिकता
आयोग को है नागरिकता की जांच का अधिकार- कोर्ट
बार एंड बेंच के मुताबिक, व्यक्ति की नागरिकता का निर्धारण करने के मामले पर कोर्ट ने कहा कि आयोग नागरिकता की जांच कर सकता है, लेकिन सिर्फ मतदाता सूची के दृष्टिकोण से। कोर्ट ने कहा, "मतदाता सूची तैयार करने या उसमें संशोधन करने के दौरान आयोग को नागरिकता से संबंधित प्रश्नों की जांच करने का पूर्ण अधिकार है। हालांकि, ऐसी जांच केवल मतदाता सूची में नाम शामिल करने या न करने के सीमित दृष्टिकोण से ही की जा सकती है।"
नागरिकता
केंद्र के पास भेज सकता है आयोग
कोर्ट ने कहा कि अगर व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत सामग्री से आयोग संतुष्ट नहीं होता है तो वह नामांकन अस्वीकार करने या नाम हटाने की कार्रवाई शुरू कर सकता है। हालांकि, इससे यह साबित नही होता कि व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में आयोग व्यक्ति द्वारा मतदाता सूची में शामिल होने की वैधानिक शर्तों पर संतुष्ट नहीं होता है तो वह ऐसे व्यक्ति को केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकारी के पास भेज सकता है।
विवाद
क्या है पूरा मामला?
आयोग ने पिछले साल बिहार में SIR शुरू किया था, जिसकी वैधता को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) समेत कई नेताओं ने चुनौती दी थी। इसके बावजूद, कोर्ट ने SIR पर रोक नहीं लगाई और बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में यह हुआ, जिसमें लाखों मतदाताओं के नाम काट दिए गए। आयोग ने SIR का बचाव किया। इसके बाद कोर्ट ने मतदाता सूची से हटे नामों को लेकर आदेश देने से इनकार कर दिया।