सबरीमाला मामला: सुप्रीम कोर्ट की 2 टूक- अधिकार और धर्म मिलाए तो 'बदल जाएगा भारत का धर्म'
सुप्रीम कोर्ट एक बार फिर सबरीमाला मामले पर सुनवाई कर रहा है। मुख्य तौर पर ये देखा जा रहा है कि महिलाओं को धार्मिक स्थलों में जाने की अनुमति मिलेगी या नहीं और किसी व्यक्ति की निजी आस्था समाज के नियमों में कैसे फिट बैठती है। न्यायमूर्ति बीवी नागरथना ने साफ-साफ कहा है कि समानता और धार्मिक आजादी जैसे बुनियादी अधिकार अपने आप में अलग हैं और इन्हें धर्म के रीति-रिवाजों के साथ नहीं मिलाना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ऐसा किया गया, तो भारत में धर्म का पूरा स्वरूप बदल सकता है।
न्यायाधीश सामाजिक सुधार और परंपरा के बीच तौल रहे हैं
न्यायमूर्ति नागरथना ने हिंदू धर्म को जीवन जीने का एक तरीका बताया। उनका कहना था कि मंदिर जाना जरूरी नहीं, कोई भी व्यक्ति बिना मंदिर जाए भी हिंदू हो सकता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने कहा कि घर में दीया जलाना भी तो निजी विश्वास का हिस्सा है। न्यायाधीश इस बात पर विचार कर रहे हैं कि सामाजिक सुधार और परंपरा के बीच तालमेल कैसे बिठाया जाए और क्या अदालतें धार्मिक रीति-रिवाजों में दखल दे सकती हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि किसी व्यक्ति के अधिकारों और समाज की परंपराओं, दोनों की रक्षा कैसे की जाए?