सुप्रीम कोर्ट ने पायजामा की डोरी खोलने को रेप का प्रयास माना, हाईकोर्ट की टिप्पणी खारिज
क्या है खबर?
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस विवादित फैसले को पलट दिया है, जिसमें कहा गया था कि किसी बच्ची के स्तन पकड़ना और उसके पायजामे की डोरी खोलना रेप का प्रयास नहीं है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और एनवी अंजारी की पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए इस बात पर जोर दिया कि यौन अपराध के मामलों में न्यायनिर्णय कानून और सहानुभूति पर आधारित होना चाहिए।
फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा, "हम हाई कोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हो सकते कि आरोप केवल रेप के अपराध को अंजाम देने की तैयारी के बराबर हैं, न कि प्रयास के। कोर्ट ने कहा, "हमारे निर्णय, आम नागरिकों द्वारा सामना की जाने वाली प्रक्रिया को निर्धारित करने से लेकर अंतिम निर्णय तक, करुणा, मानवता और समझ की भावना को प्रतिबिंबित करना चाहिए, जो एक निष्पक्ष और प्रभावी न्याय प्रणाली के निर्माण के लिए आवश्यक हैं।"
सुधार
कोर्ट ने सुधार की आवश्यकता बताई
बार एंड बेंच के मुताबिक, पीठ ने चेतावनी दी कि अगर अदालतें वादियों की कमजोरियों के प्रति असंवेदनशील हैं तो वे पूर्ण न्याय प्रदान नहीं कर सकतीं। कोर्ट ने व्यवस्थागत सुधार की आवश्यकता बताते हुए कहा, "इसमें कोई संदेह नहीं कि न्यायपालिका के सदस्यों के दृष्टिकोण के साथ-साथ संबंधित अदालती प्रक्रियाओं में अंतर्निहित संवेदनशीलता और विवेक को विकसित करने के लिए कार्रवाई करने की आवश्यकता है।" कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीशों के बीच संवेदनशीलता के लिए कदम उठाए जाने चाहिए।
समिति
संवेदनशीलता के लिए समिति बनाई गई
कोर्ट ने 10 फरवरी को दिए फैसले में न्यायाधीशों को नियंत्रित करने के लिए कोई दिशानिर्देश तैयार करने से इनकार कर दिया। हालांकि, इसने भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) से यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों के संदर्भ में न्यायाधीशों और न्यायिक प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता और करुणा विकसित करने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने का अनुरोध किया। समिति को सरल भाषा में बनाई अपनी रिपोर्ट 3 महीने में देनी है।
मामला
क्या है इलाहाबाद हाई कोर्ट की टिप्पणी का मामला?
इलाहाबाद कोर्ट ने 17 मार्च, 2025 को 2 आरोपियों के खिलाफ जारी समन आदेश में संशोधन करते हुए "पायजामा की डोरी" संबंधी विवादित टिप्पणी की थी। पहले ट्रायल कोर्ट ने POCSO अधिनियम के तहत बलात्कार के प्रयास और उससे संबंधित आरोप लगाने के लिए समन जारी किया था। हाई कोर्ट ने आरोपों को IPC की धारा 354-बी (वस्त्र उतारने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग) और POCSO अधिनियम के तहत गंभीर यौन उत्पीड़न में बदल दिया।
टिप्पणी
हाई कोर्ट ने क्या टिप्पणी की थी?
न्यायमूर्ति राममनोहर नारायण मिश्रा ने समन आदेश संशोधित करते हुए टिप्पणी की थी, "आरोपी पवन-आकाश पर आरोप है कि उन्होंने पीड़िता के स्तन पकड़े और पीड़िता के निचले वस्त्र उतारने की कोशिश की। उन्होंने पीड़िता के निचले वस्त्र की डोरी तोड़ दी और उसे पुलिया के नीचे घसीटने का प्रयास किया, लेकिन वे पीड़िता को छोड़कर घटनास्थल से भाग गए। यह तथ्य इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं है कि आरोपियों ने बलात्कार करने का निश्चय किया था।"