आपके पीने के पानी में खतरनाक केमिकल्स, भारतीय जल सयंत्र हटाने में नाकाम
एक नए अध्ययन से पता चला है कि भारत में मौजूद जल शोधन संयंत्र (वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट) हमारे पानी से 'फॉरएवर केमिकल्स' (PFAS) नाम के रसायनों को हटा नहीं पा रहे हैं।
ये ऐसे जिद्दी प्रदूषक हैं, जिनका इस्तेमाल रोजमर्रा के कई सामानों में होता है। ऐसे रसायन गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों के पानी में भी पाए गए हैं।
असल समस्या यह है कि ज़्यादातर जल शोधन संयंत्रों के पास इन्हें पानी से पूरी तरह हटाने की जरूरी तकनीक ही नहीं है। यह बात हमारी सेहत और पर्यावरण, दोनों के लिए बहुत चिंताजनक है।
भारत का वर्किंग ग्रुप PFAS की तय सीमा पर कर रहा है जांच
हाल ही के एक शोध में (जिसमें IIT-मद्रास का अध्ययन भी शामिल है) यह सामने आया है कि कई बार तो शोधित पानी में भी बिना शोधित पानी के मुकाबले ज्यादा PFAS पाया जाता है। इससे साफ पता चलता है कि पानी को साफ करने के मौजूदा तरीके इन रसायनों पर बिल्कुल काम नहीं कर रहे हैं।
हाई-रिजॉल्यूशन मास स्पेक्ट्रोमेट्री जैसे कुछ आधुनिक उपकरण एक तय सूची से बाहर के PFAS रसायनों को भी पहचानने में मदद कर सकते हैं, लेकिन इस पर भी सावधानी बरतनी होगी। दरअसल, सैंपल इकट्ठा करने और उनकी जांच के दौरान भी PFAS उनमें मिल सकते हैं।
भारत अपने पीने के पानी से जुड़े नियमों में बदलाव कर रहा है और एक वर्किंग ग्रुप PFAS की अधिकतम तय सीमा और इनकी जांच के तरीकों पर विचार कर रहा है। यह नल के पानी को और सुरक्षित बनाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।