सबरीमाला मामला: सुप्रीम कोर्ट ने 16 दिन सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा, क्या-क्या हुआ?
क्या है खबर?
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर सहित अन्य धार्मिक स्थानों पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई पूरी हो गई है। कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ ने मामले पर लगातार 16 दिन तक सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब कोर्ट ने सभी पक्षकारों को 29 मई तक लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। आइए समझते हैं सुनवाई के दौरान क्या-क्या हुआ?
पीठ
पीठ में कौन-कौन शामिल था?
सुनवाई मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की पीठ ने की। इसमें जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रशांत वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की पीठ ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक बताया था। इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दायर हुई थीं, इसलिए मामला बड़ी पीठ को भेजा गया।
याचिकाएं
किन-किन मामलों पर हुई सुनवाई?
कोर्ट में सबरीमाला के अलावा कई और याचिकाओं पर भी सुनवाई हुई। इनमें मुंबई की हाजी अली दरगाह में महिलाओं को अंदरूनी हिस्से में प्रवेश से रोकने का मामला भी है।
इसके अलावा दाऊदी बोहरा समुदाय में कथित तौर पर होने वाली खतना प्रथा को भी चुनौती दी गई है।
वहीं, पारसी समुदाय की महिलाओं द्वारा गैर-पारसी पुरुषों से शादी करने के बाद उन्हें कुछ मंदिरों में प्रवेश नहीं देने का मामला भी शामिल हैं।
सवाल
कोर्ट ने तय किए 7 संवैधानिक सवाल
अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरा क्या है?
नैतिकता और संवैधानिक नैतिकता की परिभाषा और इनमें क्या अंतर है?
धार्मिक मामलों में कोर्ट के हस्तक्षेप या समीक्षा की सीमा कहां तक?
अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 के बीच अंतर कैसे तय किया जाए?
धार्मिक प्रथाएं मौलिक अधिकारों से ऊपर हो सकती हैं?
क्या किसी धार्मिक प्रथा को गैर-श्रद्धालु अदालत में चुनौती दे सकता है?
अनुच्छेद 25(2)(बी) में 'हिंदुओं के वर्ग' को किस तरह समझा जाए?
सरकार
केंद्र सरकार ने क्या तर्क दिए?
केंद्र सरकार ने कोर्ट से सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को बरकरार रखने का अनुरोध किया था।
सरकार ने तर्क दिया कि यह मुद्दा धार्मिक विश्वास और सांप्रदायिक स्वायत्तता के दायरे में आता है और न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है।
सुनवाई के दौरान सरकार ने कहा, "कोर्ट धार्मिक स्थलों में प्रवेश के मामले में दखल नहीं दे सकतीं। अगर कोई प्रथा गैर-वैज्ञानिक लगती है, तो उसका हल संसद या विधानसभा के पास है।"
बड़ी टिप्पणियां
पीठ ने की ये बड़ी टिप्पणियां
समाज सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का हनन नहीं हो सकता।
संवैधानिकवाद पर बहुसंख्यकवाद हावी नहीं होगा।
हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाने की जरूरत नहीं, घर में दीया जलाना ही काफी।
मंदिरों में प्रवेश रोकने से समाज बंटेगा, हिंदू धर्म को नुकसान होगा।
संविधान सबसे ऊपर, निजी धार्मिक मान्यताओं से उठकर फैसला जरूरी।
मूर्ति छूना ईश्वर का अपमान कैसे हो सकता है और इससे वे अपवित्र कैसे हो जाते हैं?
टाइमलाइन
मामले को लेकर अब तक क्या-क्या हुआ?
1991 में केरल हाई कोर्ट ने मंदिर में 10-50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया।
2006 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
2018 में 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटा दिया। इसके बाद राज्य में विरोध प्रदर्शन हुए।
2 जनवरी, 2019 को पहली बार 2 महिलाओं ने मंदिर में प्रवेश किया।
फैसले की समीक्षा की मांग वाली कई याचिकाएं दायर हुईं।