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#NewsBytesExplainer: FCRA विधेयक में क्या हैं प्रावधान, जिसका अमेरिका से लेकर भारत तक हो रहा विरोध?
सरकार FCRA के नियमों में संशोधन के लिए विधेयक लाने की तैयारी कर रही है

#NewsBytesExplainer: FCRA विधेयक में क्या हैं प्रावधान, जिसका अमेरिका से लेकर भारत तक हो रहा विरोध?

लेखन आबिद खान
Aug 06, 2026
01:14 pm

क्या है खबर?

खबर है कि संसद के मानसून सत्र के दौरान सरकार विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को पेश कर सकती है। DMK NCP-SP जैसी कई पार्टियां इस विधेयक का विरोध कर रही हैं। यहां तक कि एक अमेरिकी सांसद ने भी विधेयक के विरोध में आवाज उठाई है। आज ही कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी कहा कि ये विधेयक पारदर्शिता के लिए नहीं, बल्कि नियंत्रण के लिए लाया जा रहा है। आइए विधेयक के बारे में जानते हैं।

FCRA

सबसे पहले जानिए क्या है FCRA

FCRA के जरिए विदेशी फंडिंग का विनियमन होता है। इसे 1976 में लागू किया गया था।

इसके तहत सभी एसोसिएशन, समूह और NGO को विदेशी फंडिंग हासिल करने केे लिए इसके नियमों का पालन करना जरूरी है। FCRA तय करता है कि कौन-से NGO, ट्रस्ट और सामाजिक या धार्मिक संगठन विदेश से फंड ले सकते हैं और उसका इस्तेमाल कैसे करेंगे।

इसका मकसद विदेशी फंड के गलत इस्तेमाल को रोकना और राष्ट्रीय सुरक्षा व सार्वजनिक हित की रक्षा करना है।

लाइसेंस

FCRA लाइसेंस के लिए करना होता है इन शर्तों का पालन

FCRA के तहत, विदेशी चंदा प्राप्त करने के संगठनों को या तो लाइसेंस लेना होता है या गृह मंत्रालय से अनुमति लेनी होती है।

गृह मंत्रालय की गाइडलाइंस के मुताबिक, सभी NGO का सरकारी या प्राइवेट बैंक में खाता होना अनिवार्य है। संगठनों को यह भी प्रमाण पत्र देना होता है कि विदेशी फंडिंग से भारत की संप्रभुता और अखंडता खतरे में नहीं पड़ेगी।

इसके अलावा सालाना रिटर्न, रिपोर्टिंग और रिकॉर्ड संबंधी भी कई शर्तें माननी होती हैं।

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विधेयक

नए विधेयक में क्या बदलाव प्रस्तावित हैं?

नए विधेयक में सरकार एक नामित प्राधिकरण को FCRA लाइसेंस रद्द होने की स्थिति में विदेशी फंडिंग से बनी संपत्तियों की देखरेख या उनका निपटान करने की ताकत दे सकती है।

विधेयक के मसौदे में अतिरिक्त रिपोर्टिंग का भी प्रस्ताव है, जिसमें परियोजनाओं का अधिक खुलासा और विदेशी योगदान का उपयोग शामिल है।

यानी इसमें फंडिंग और संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर एक व्यापक ढांचा तैयार करने का प्रस्ताव है।

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अन्य बदलाव

विधेयक के जरिए ये बदलाव भी हो सकते हैं

संगठनों को धार्मिक स्थलों से जुड़ी संपत्तियों का धार्मिक स्वरूप बरकरार रखना होगा।

प्राधिकरण के आदेश के खिलाफ जिला न्यायाधीश के पास अपील की जा सकेगी।

कुछ खास मामलों में राज्यों को केंद्र सरकार से मंजूरी लेनी होगी।

इस विधेयक में FCRA के तहत कुछ अपराधों के लिए अधिकतम कारावास को 5 साल से घटाकर एक साल करने का भी प्रस्ताव है।

इस विधेयक को साधारण बहुमत से पारित करवाया जा सकता है।

सरकार

बदलाव क्यों कर रही है सरकार?

सरकार ने बदलावों के पीछे पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर दिया है

सरकार ने कहा कि अगर किसी संगठन का लाइसेंस निलंबित हो जाता है, तो संपत्ति शुरू में अस्थायी आधार पर नामित प्राधिकरण के पास जाएगी। अगर लाइसेंस निर्धारित अवधि के भीतर बहाल हो जाता है, तो संपत्ति वापस कर दी जाएगी।

सरकार ने यह भी कहा कि इससे पूजा स्थलों का धार्मिक स्वरूप बरकरार रहेगा और संगठनों को पुनर्विचार और न्यायिक अपील का अधिकार होगा।

चर्च

NGO और चर्च क्यों कर रहे हैं विरोध?

चर्च संगठनों का कहना है कि विदेशी योगदान ने दशकों से स्कूलों, अस्पतालों और सामुदायिक कल्याण कार्यक्रमों को चलाने में मदद की है।

वहीं, कुछ NGO का मानना है कि विदेशी वित्त पोषित संपत्तियों के प्रबंधन में सरकार की बढ़ती भागीदारी इन क्षेत्रों में काम करने वाली संस्थाओं की स्वायत्तता को प्रभावित कर सकती है।

मिजोरम के बैपटिस्ट चर्च ने केंद्र से विधेयक को वापस लेने का आग्रह किया और इसके खिलाफ सामूहिक प्रार्थना सभाओं का आयोजन किया है।

विरोध

विधेयक का कौन कर रहा विरोध?

अमेरिकी सांसद राइली एम मूर ने प्रस्तावित विधेयक की आलोचना करते हुए कहा कि यह भारत सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थाओं पर कब्जा करने की अनुमति देता है।

थरूर ने आरोप लगाया कि यह विधेयक भारतीय राज्य और नागरिक समाज के बीच के संबंधों को मौलिक रूप से बदलने की कोशिश है।

इंडिया टुडे के मुताबिक, NCP-SP और DMK ने भी कहा है कि वे विधेयक के मौजूदा स्वरूप का विरोध करते हैं।

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