भारतीय सेना मेरठ में बना रही देश का पहला ड्रोन रनवे, क्या है खासियत?
क्या है खबर?
'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद भारत लगातार सेना को उन्नत और नए जमाने के युद्ध के हिसाब से ढाल रहा है। भारतीय सेना मेरठ में ड्रोन और रिमोटली पायलेटेड एयरक्राफ्ट (RPA) के लिए पहला समर्पित रनवे बनाने जा रही है। यह बेस मेरठ में 900 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैला होगा। रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले BRO ने ज्यादा ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ान भरने वाले (HALE) ड्रोन के लिए बेस की निर्माण प्रक्रिया शुरू कर दी है।
रिपोर्ट
कैसा होगा पहला ड्रोन रनवे?
न्यूज18 की रिपोर्ट के मुताबिक, BRO ने 406 करोड़ रुपये की इस परियोजना के लिए परियोजना प्रबंधन परामर्श सेवाओं हेतु बोलियां आमंत्रित की हैं। बेस के बीचोबीच 2,110 मीटर लंबा और 45 मीटर चौड़ा रनवे होगा, जिस पर रिमोट संचालित विमानों (RPA) के साथ ही C-295 और C-130 श्रेणी के परिवहन विमान भी संचालित हो सकेंगे। बेस पर विमानों और ड्रोन को रखने के लिए 60 मीटर चौड़े और 50 मीटर लंबे 2 हैंगर भी बनाए जाएंगे।
खासियत
क्या है रनवे की खासियत?
रनवे पर ICAO CAT-II मानकों के अनुरूप प्रकाश व्यवस्था और आधुनिक नेविगेशन उपकरण लगाए जाएंगे, जिससे कम दृश्यता में भी संचालन संभव हो सकेगा। यहां से भारी विमानों की आवाजाही के साथ लगभग 1,500 RPA संचालित होने की उम्मीद है। यानी हर दिन लगभग 4 ड्रोन उड़ानें। बेस को इस तरह से डिजाइन किया जा रहा है कि ये यहां से परिचालन करने वाले सैनिकों के लिए केवल एक हवाई पट्टी नहीं, बल्कि रणनीतिक केंद्र होगा।
निर्माण
कब तक पूरा होगा निर्माण?
रिपोर्ट के मुताबिक, सेना ने बेस के निर्माण को पूरा करने के लिए 85 महीने की समयसीमा निर्धारित की है। इसमें से 7 महीने पूर्व-ठेका योजना और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करने के लिए आवंटित किए गए हैं। इसके बाद 18 महीने की अवधि निर्माण कार्य के लिए तय की गई है। इसके अलावा 24 महीने डिफेक्ट लायबिलिटी और बाकी के 36 महीने रखरखाव और निगरानी के लिए तय किए गए हैं।
वजह
सेना ने क्यों उठाया ये कदम?
यह परियोजना ऐसे समय में शुरू हुई है, जब सैन्य अभियानों में ड्रोन की भूमिका बेहद अहम हो गई है। 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भी पाकिस्तान की ओर से ड्रोन का इस्तेमाल व्यापक तौर पर किया गया था। हालांकि, भारत की ड्रोन रोधी प्रणालियों ने ज्यादातर ड्रोन को मार गिराया था। इस अभियान के बाद मिले सबक ने मानवरहित मिशनों के लिए बुनियादी ढांचे के महत्व को और मजबूत किया है।