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#NewsBytesExplainer: क्या लॉरेंस बिश्नोई को अमेरिका को सौंपेगा भारत?
अमेरिका ने कई मामलों में लॉरेंस बिश्नोई पर आरोप तय किए हैं

#NewsBytesExplainer: क्या लॉरेंस बिश्नोई को अमेरिका को सौंपेगा भारत?

लेखन आबिद खान
Jul 10, 2026
12:31 pm

क्या है खबर?

अमेरिका के न्याय विभाग ने जेल में बंद गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई और कई अन्य लोगों पर आपराधिक गैंग चलाने, हत्या और जबरन वसूली जैसे आरोप लगाए हैं। लॉरेंस को कनाडा में हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भी आरोपी बनाया गया है। वहीं, 3 गैंग से जुड़े 24 अपराधी गिरफ्तार भी किए गए हैं। माना जा रहा है कि अमेरिका लॉरेंस के प्रत्यर्पण की मांग कर सकता है। आइए समझते हैं क्या भारत को लॉरेंस को अमेरिका को सौंपना होगा।

संधि

क्या भारत-अमेरिका के बीच है प्रत्यर्पण संधि?

भारत में 1962 में प्रत्यर्पण कानून बना था। इसी के तहत दूसरे देशों से प्रत्यर्पण संधि की जाती है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, भारत की 48 देशों के साथ ऐसी संधि है। भारत ने 1997 में अमेरिका के साथ प्रत्यर्पण संधि की थी। इस संधि का मुख्य आधार 'दोहरे अपराध' का सिद्धांत है। यानी किसी अपराध के लिए प्रत्यर्पण तभी हो सकता है, जब उस अपराध के लिए दोनों देशों में एक साल से ज्यादा सजा का प्रावधान हो।

शर्तं

क्या है भारत-अमेरिका प्रत्यर्पण संधि की शर्तें?

संधि के तहत, हत्या, बंधक बनाना, आतंकवाद और ड्रग तस्करी जैसे अपराधों में शामिल अपराधियों का प्रत्यर्पण किया जा सकता है। हालांकि, राजनीतिक अपराधों के लिए किसी का प्रत्यर्पण नहीं किया जा सकता। एक बड़ी शर्त ये भी है कि प्रत्यर्पित व्यक्ति पर आम तौर पर सिर्फ उन्हीं अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है, जिनके लिए उसका प्रत्यर्पण किया गया था। इसे 'स्पेशियलिटी का नियम' कहा जाता है।

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बिश्नोई

लॉरेंस पर लगाए आरोप क्या संधि के दायरे में आते हैं?

मोटा-मोटी लॉरेंस पर जो आरोप तय किए गए हैं, वे संधि में शामिल प्रत्यर्पण की शर्तों को पूरा करते हैं। लॉरेंस पर हत्या, आपराधिक साजिश, जबरन वसूली, ड्रग तस्करी और हथियारों की तस्करी में शामिल होने के आरोप हैं। ये अपराध भारतीय कानून के तहत भी दंडनीय हैं। संधि में ये कहा गया है कि दोनों देशों के कानून में अपराध का वर्णन या उनकी श्रेणी एक ही तरह की हो, ये जरूरी नहीं है।

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अनुरोध

कैसी होगी प्रत्यर्पण की प्रक्रिया?

आमतौर पर अमेरिकी न्याय विभाग प्रत्यर्पण का अनुरोध तैयार करता है और इसे भारत के विदेश मंत्रालय को भेजा जाता है। भारतीय विदेश मंत्रालय गृह मंत्रालय और CBI जैसी एजेंसियों से सलाह कर यह जांचता है कि क्या अनुरोध संधि और प्रत्यर्पण कानून के मुताबिक है। अगर सरकार को लगता है कि अनुरोध पर विचार किया जाना चाहिए, तो इसे कोर्ट में पेश किया जाता है। कोर्ट जांचता है कि क्या संधि की शर्तें पूरी हो रही हैं।

फैसला

केंद्र सरकार का होता है अंतिम फैसला

अगर कोर्ट आरोपों और अपराधों को संधि की शर्तों के अनुरूप मानता है, तो वह आरोपी को प्रत्यर्पण के योग्य मानती है और अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजती है। प्रत्यर्पण पर आखिरी फैसला केंद्र सरकार का होता है, जो मंजूरी देने से पहले शर्तें लगा सकती है या राजनयिक आश्वासन मांग सकती है। आदेश को हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है, जिससे प्रत्यर्पण की प्रक्रिया आमतौर पर लंबी हो जाती है।

लॉरेंस का प्रत्यर्पण

लॉरेंस के मामले में 

लॉरेंस के मामले में अहम कानूनी तथ्य यह है कि वह पहले से ही न्यायिक हिरासत में है और उस पर भारत में कई आपराधिक मामले चल रहे हैं। ऐसे में भारत के सामने ये विकल्प होगा कि वो कानूनी कार्यवाही जारी रहने का हवाला देते हुए प्रत्यर्पण को टाल सकता है। भारत यह तर्क दे सकता है कि प्रत्यर्पण से पहले लॉरेंस को मुकदमों का सामना करना होगा और दोषी पाए जाने पर सजा काटनी होगी।

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